हमारे बारे में/About

WHICH SIDE ARE YOU ON?

Fascists are continuously doing their work, whether they are in power or not. They work by poisoning hearts and minds of people, lies and false propaganda are their main weapons, their discourse is full of irrationality and abusive language, trickery-falsehood-hypocrisy and vile anti-humanism is their culture. Progressive people, working class, women, minorities, oppressed-dalit castes and communities are their biggest enemy….

They are doing their work continuously… but those who oppose them, who are in majority, they are quiet, inactive, and complacent…

I believe that electoral defeat can not eliminate them. They are not least bit perturbed by debates in parliament and on TV channels. Mere symbolic resistance of fascism in discussion rooms of metropolitan cities will not harm them. The need of the hour is not an inactive, passive, subtle protests but an all out attack. They must be exposed in society to the grass roots levels. The open and dubious proponents of these forces need to tackle in every field including ideology, art, culture, literature and politics. Their web of false propaganda needs to be demolished…

The nuances of these brain-children of Hitler and Mussolini are unchecked in the cyber world. They use blogs and sites to propagate their puranas of falsehood. They keep repeating their narrow orthodox chants. No sooner than a pinching logical argument is put forth they attack in a group and try to silence it in their nonsensical chattering. Most people do not confront them; they are more concerned about protecting their nobility and choose to sit on the fence with the attitude “they are not worth it?”

Hindu fundamentalist forces keep on spreading poisonous weeds through government machinery, networks of the RSS, rumors, their infiltration in media and various programmes organised under the banner of religion. Whatever counter-attacks are launched against them are mostly limited to the circle of educated people and intelligentsia. Even these are mostly in English. These forces have now spread their tentacles in the realm of web as well. Interestingly, these forces which are against science and scientific temperament are not at all lacking in the use of latest technology. This is true for saffronised fascists of our country as well as fundamentalist Talibans.
Now the time has come to not only expose them threadbare but to reveal the true face of their ideology, their reactionary aims, their shameful history and the character of their leaders. The time has come to choose our stand between the struggle to take history forward or to turn the wheels of history backwards.
This site will be an attempt in this direction. Therefore I would request you to join this movement.

We shall try to expose the political-economic-ideological roots which give rise to fascism, to reveal fascist ideology, politics and organisations, to bring their black deeds to light, to counter their facts and logic and along with that we would strive to bring forward the works of poets-writers-artists all over the world, to collect audio-video content at one place, to highlight the history of struggles of common people against fascism. We would also try to differentiate between religion and fundamentalism, and to carry forward debates and discussions on the scientific materialist view of religion, the question of secularism etc.
Please give us your opinion and help. You can contribute in this mission by:
• Writing for the site
• Translating content for this website
• Helping in collecting information from all over the world
• By providing monetary help in hosting and running this site.

EMAIL: smash dot fascism at yahoo dot com
———————————————————————————

जो तटस्‍थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध…

जलती लाशों की चिरायंध हवा में गुम हुए ज़्यादा समय नहीं बीता है, काटती-जलाती उन्‍मादी भीड़ और बलात्‍कृत स्त्रियों की ख़बरों को अखबारों के पन्‍नों से विस्‍थापित हुए अभी ज़्यादा दिन नहीं गुज़रे हैं। चुनावी शोर-शराबे के बीच भी अंधी बर्बरता के इन पुजारियों, लाशों के ढेर पर श्‍मशान-नृत्‍य करने वाले इन कापालिकों की हुंकारें और वहशी मंत्रोच्‍चार एक अशनि संकेत की तरह सुनाई दे रहे हैं।

वे सत्ता में हों, या सत्ता से बाहर, लगातार अपना काम कर रहे हैं। लोगों के दिमाग़ों में ज़हर और दिलों में नफ़रत भरना उनका तरीक़ा है, झूठ और कुत्‍सा-प्रचार उनके सबसे बड़े अस्‍त्र हैं, कुतर्क और गाली-गलौच ही उनका विमर्श है, छल-छद्म-पाखंड और कुत्सित मानवद्रोह उनकी संस्‍कृति है। प्रगतिकामी लोग, मेहनतकश अवाम, स्त्रियाँ, अल्‍पसंख्‍यक, दमित-दलित-उत्‍पीडि़त जातियाँ और समुदाय उनके सबसे बड़े दुश्‍मन हैं… वे अपने काम में लगे हुए हैं लगातार… लेकिन जो उनके विरुद्ध हैं, जो उनसे कई गुना ज़्यादा हैं, वे ख़ामोश हैं, निष्क्रिय हैं, ख़ुशफ़हमियों के सहारे हैं…

चुनावों में हार से वे ख़त्‍म नहीं हो जाएंगे। संसद में सरकंडे के तीर चलाने और टीवी चैनलों पर गत्ते की तलवारें भाँजने से उनका बाल बाँका नहीं होगा। महज़ महानगरों के गोष्‍ठीकक्षों या मंडी हाउस में फ़ासीवाद के प्रतीकात्‍मक विरोध से उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। ठंडे, निष्क्रिय, सुंदर-सुव्‍यवस्थित विरोध की नहीं, इनके विरुद्ध चौतरफा प्रत्‍याक्रमण की ज़रूरत है। व्‍यापक समाज में, तृणमूल स्‍तर तक जाकर इनकी असलियत को नंगा करना होगा। विचार, राजनीति, कला-साहित्‍य-संस्‍कृति हर स्‍तर पर इन शक्तियों और इनके प्रत्‍यक्ष और प्रच्‍छन्‍न प्रवक्‍ताओं से टकराना होगा। उनके झूठ के भ्रमजाल को काटना होगा…

साइबर जगत में हिटलर और मुसोलिनी के इन मानसपुत्रों की धमाचौकड़ी कुछ ज़्यादा ही बेरोकटोक है। इंटरनेट साइटों और ब्‍लॉगों पर ये लगातार अपना झूठ-पुराण फैलाते रहते हैं और अपना कूपमंडूकी दकियानूसी राग अलापते रहते हैं। इन्‍हें चुभने वाली कोई भी सच्‍ची, प्रगतिशील, जनपक्षधर बात सामने आते ही ये उस पर टूट पड़ते हैं और अपनी कौआ-रोर से उसे चुप कराने की कोशिश में जुट जाते हैं। ज़्यादातर लोग ”इनके मुँह कौन लगे?” वाले अंदाज़ में अपनी शालीनता और भद्रता को सीने से लगाए चुपचाप किनारा कर जाते हैं।

हिन्‍दुत्‍ववादी शक्तियाँ सरकारी तंत्र, संघ परिवारी संगठनों के नेटवर्क, अफ़वाहों, संघी घुसपैठ वाले मीडिया और धर्म की आड़ में चलाए जाने वाले तमाम कार्यक्रमों के ज़रिए समाज में अपने ज़हरीले बीज छींटती रहती हैं जबकि इनके झूठे प्रचारों का जो जवाब दिया भी जाता है वह महज़ पढ़ी-लिखी आबादी के छोटे-से हिस्‍से में सीमित रह जाता है। इसका भी बड़ा हिस्‍सा अंग्रेज़ी में होता है।

अब इन्‍होंने नए मीडिया यानी इंटरनेट को भी अपने विषैले प्रचार का ज़रिया बना लिया है। दिलचस्‍प बात ये है कि विज्ञान और वैज्ञानिकता की घोर विरोधी ये शक्तियाँ आधुनिक टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल करने में कतई पीछे नहीं हैं। चाहे ये हमारे यहाँ के भगवापंथी फ़ासिस्‍ट हों या फिर अमेरिका के पैदा किए हुए तालिबानी कट्टरपंथी।

अब वक्‍़त आ गया है कि इनके हर झूठ को तार-तार और इनके हर कुतर्क को ध्‍वस्‍त ही नहीं किया जाए बल्कि इनकी विचारधारा, इनके काले मंसूबों, इनके शर्मनाक इतिहास और इनके धर्मध्‍वजाधारियों के चाल-चेहरे-चरित्र को बेपर्दा किया जाए। इतिहास को आगे ले जाने की चाहत और वक्‍़त के पहिए को उल्‍टा घुमाने की कोशिशों के बीच मज़बूती से अपना पक्ष चुना जाए।

यह ब्‍लॉग इसी कोशिश का एक हिस्‍सा है। हम समान सोच वाले सभी ब्‍लॉगरों से, और सभी लेखक, पत्रकार, संस्‍कृतिकर्मी, ऐक्टिविस्‍ट मित्रों से, और सभी प्रबुद्ध, संवेदनशील व्‍यक्तियों से आग्रह करेंगे कि इस मुहिम में हमारे साथ शामिल हों।

हमारी कोशिश होगी कि हम फ़ासीवाद के उभार की राजनीतिक-आर्थिक-वैचारिक जड़ों को सामने लाएं, फ़ासीवादी विचारधारा, राजनीति और संगठनों को उजागर करें, उनके कारनामों का पर्दाफाश करें, उनके फैलाये कुप्रचारों को तर्कों और तथ्‍यों से ग़लत साबित करने के साथ-साथ दुनियाभर में फ़ासीवाद के विरुद्ध कवियों-लेखकों-विचारकों के लेखन को सामने लाएं, इस विषय पर ऑडियो-वीडियो सामग्री या उसके परिचय को एक जगह एकत्रित करें, फ़ासीवाद के विरुद्ध व्‍यापक अवाम के संघर्ष के इतिहास को सामने लाएं। इसके साथ ही धर्म और सांप्रदायिकता के अंतर को स्‍पष्‍ट करने, धर्म के वैज्ञानिक भौतिकवादी नज़रिए पर चर्चा करने, सेकुलरिज़्म के सवाल पर बहस चलाने की भी हमारी कोशिश होगी। बेशक, विरोधी विचारों के लिए इसमें स्‍थान प्रतिबंधित नहीं है। लेकिन बहस तर्कों से होनी चाहिए, गाली-गलौच से नहीं।


Read in your language

सब्‍सक्राइब करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हाल ही में


फ़ासीवाद, धार्मिक कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता संबंधी स्रोत सामग्री

यहां जिन वेबसाइट्स या ब्‍लॉग्‍स के लिंक दिए गए हैं, उन पर प्रकाशित विचारों-सामग्री से हमारी पूरी सहमति नहीं है। लेकिन एक ही स्‍थान पर स्रोत-सामग्री जुटाने के इरादे से यहां ये लिंक दिए जा रहे हैं।
 

हाल ही में

आर्काइव

कैटेगरी

Translate in your language