गाजा : वे फिर उठेंगे किसी नए प्रगतिकामी संगठन के झंडे तले…

July 11th, 2014  |  Published in प्रतिरोध/Resistance, Featured  |  1 Comment

अमर नदीम

अमर नदीम

जियनवादी-साम्राज्‍यवादियों द्वारा गाजा में किए जा रहे नरसंहार पर साथी अमर नदीम ने ‘बर्बरता के विरुद्ध’ के लिए यह टिप्‍पणी भेजी है। वे लिखते हैं: ”फिलहाल तो मीडिया इजराइल के इस अमानवीय आतंकवादी हमले पर दो तरह के रुख अपनाए हुए है. या तो वह जान बूझ कर चुप्पी साधे हुए है या फिर यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि इजराइल तो सिर्फ अपने ऊपर हुए हमास के हमले का उत्तर दे रहा है. कुछ याद आया? गुजरात के नरसंहार के बाद भी ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ जैसा सिद्धांत बघारा गया था।”  

—————————————————————————————————————

सुना है कि जब रोम जल रहा था उस समय नीरो बाँसुरी बजा रहा था. अब इसमें अजीब क्या है? हमारे तमाम महापुरुषों का कहना है कि ‘कला कला के लिये’ होती है और उसे दीन-दुनिया से कुछ लेना-देना नहीं होता. कला के प्रति इतना गहरा समर्पण कम ही देखने को मिलता है. पर आज के नीरो आधुनिक हैं. वे बाँसुरी नहीं बजाते. जब फिलिस्तीनी नागरिक महिलायें और मासूम बच्चे इसरायली बमबारी में मारे जा रहे होते हैं उया वक़्त वे फुटबाल के या क्रिकेट के मैच देखते हैं. खेल भी तो भाईचारे की भावना को बढ़ाते हैं. आधुनिक नीरो बमबारी का जवाब भाईचारे से दे रहे हैं – मगर अपने तरीके से.

कहा जाता है कि कोई 2000 साल पहले यहूदियों को उस जगह से निकाल दिया गया था जहां आज का इजराइल मौजूद है. और इस लिए वहां बसे सारे फिलिस्तीनी अरबों को मार कर या वहां से भगा कर वहां कब्ज़ा करना इजराइल का इतिहास सम्मत अधिकार है. हम तो साहब कायल हो गए उनके इतिहासबोध के. हमने तो बस कुछ सौ साल पुरानी मस्जिद ही गिराई ताकि वहां बाबर के ज़माने में ‘गिराये गये मंदिर’ का बदला लेकर एक नया मंदिर वहां बना सकें. पर ये इसरायली तो हज़ारों साल पहले के गड़े मुर्दे उखाड़ लाये और उनकी जगह जीते-जागते इंसानों को मुर्दा बना रहे हैं.

10353185_683820295042343_7256126123909265660_nगाजा पट्टी के 360 वर्ग किलोमीटर के इलाके में 16 लाख से अधिक फिलिस्तीनी ठुंसे हुए रहने को मजबूर हैं और अब इजराइल वहां भी अपनी फौजें भेजने की योजना बना रहा है. पीएलओ के ग़द्दारी भरे समझौतावादी रुख के चलते हमास जैसे अतिवादी संगठन को वहां अपनी जड़ें जमाने का मौक़ा मिल गया और उसकी कीमत चुका रही है फिलिस्तीनी जनता. यासर अराफात ने यित्ज्हाक रोबिन और शिमोन पेरेस के साथ साझे में नोबेल शान्ति पुरस्कार तो ले लिया पर स्वतन्त्र सार्वभौम फिलिस्तीन का सपना एक लम्बे समय के लिए दूर चला गया. लगता है कि नोबेल पुरस्कार में अराफात, गोर्बाचोव जैसों के लिए कोई आरक्षण रहता है. खैर वो सब फिर कभी.

फिलहाल तो मीडिया इजराइल के इस अमानवीय आतंकवादी हमले पर दो तरह के रुख अपनाए हुए है. या तो वह जान बूझ कर चुप्पी साधे हुए है या फिर यह दिखाने का प्रयास कर रहा है कि इजराइल तो सिर्फ अपने ऊपर हुए हमास के हमले का उत्तर दे रहा है. कुछ याद आया? गुजरात के नरसंहार के बाद भी ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ जैसा सिद्धांत बघारा गया था.

पर इतिहास के कुछ सबक याद रखने की ज़रूरत है. हिटलर जैसा दुर्दांत नरपिशाच भी अपने सारे प्रयासों के बावजूद यहूदियों को निर्मूल नहीं कर सका; वरन स्वयं ही अपने ऐतिहासिक पूर्वज नीरो की ही गति को प्राप्त हुआ अर्थात आत्महत्या करने को मजबूर हुआ. अपनी लगभग 90 साल पुरानी बकवास को लगातार दुहराते हुए और जहां तहां हत्याकांड करवाते हुए भी आरएसएस अपने घोषित शत्रुओं, मुस्लिमों और कम्युनिस्टों को न तो निर्मूल कर पाया न ही उन्हें भारत से बाहर निकाल पाया. भारत में कम्युनिस्ट आन्दोलन यदि कमज़ोर हुआ भी तो अपनी अन्तर्निहित कमजोरियों और भटकावों से न कि आरएसएस के किसी पराक्रम से. और इन कमजोरियों और भटकावों से उबरना तो तय है – जनता उन्हें इसके लिए मजबूर भी करेगी और मदद भी करेगी. इसी तरह सारे फिलिस्तीनियों को न तो निर्मूल किया जा सकता है न ही वहां से भगाया जा सकता है. वे फिर उठेंगे किसी नए प्रगतिकामी संगठन के झंडे तले और इसरायली आतंक और हमास सरीखे कट्टरपंथी संगठनों- दोनों से मुक्ति पायेंगे. एक स्वतन्त्र सार्वभौम फिलिस्तीनी राष्ट्र का सपना साकार तो अवश्य होगा भले ही कुछ देर लग जाए.

One Response

Feed
  1. शमशाद इलाही शम्स says:

    बेहद बेबाक टिप्पणी के लिए अमर नदीम साहब का शुक्रिया..दुनिया में अभी तक बड़े से बड़ा ताकतवर साम्राज्य किसी नस्ल को मिटा नहीं पाया और न इस दुनिया में मिटा सकता, न तो हमास हिज्बोल्लाह जैसे कठमुल्ला यहूदियों को मिटा सकते और न इजराइल फलस्तीनियों को मिटा पायेगा. फतह तबके की लीडरशिप और उनके भ्रष्टाचार और विकल्पों के आभाव में इन फासीवादी ताकतों को बल मिला जो आज जनतंत्र के नाम पर सत्ता में आ बैठे और विरोध की हर आवाज़ को कुचल रहे है. इनके पास जनता की समस्या सुलझाने का कोई कार्यक्रम नहीं है, इनके नेतृत्व में फलस्तीनी गाजर मूली की तरह कट रहे है..हमास और इस्लामी फासीवाद का विरोध किये बगैर फलस्तीन कभी आज़ाद नहीं हो सकेगा, उनका विरोध करना इसराएल का समर्थन नहीं.

Your Responses

six + nineteen =


Read in your language

सब्‍सक्राइब करें

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

हाल ही में


फ़ासीवाद, धार्मिक कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता संबंधी स्रोत सामग्री

यहां जिन वेबसाइट्स या ब्‍लॉग्‍स के लिंक दिए गए हैं, उन पर प्रकाशित विचारों-सामग्री से हमारी पूरी सहमति नहीं है। लेकिन एक ही स्‍थान पर स्रोत-सामग्री जुटाने के इरादे से यहां ये लिंक दिए जा रहे हैं।
 

हाल ही में

आर्काइव

कैटेगरी

Translate in your language