मध्य-पूर्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद की इस्लामिक कट्टरपंथ से गलबहियों के लंबे इतिहास की कुछ झलकियां

September 8th, 2014  |  Published in इतिहास/History, धार्मिक कट्टरपंथ, Featured

आनंद सिंह

इस्‍लामिक स्‍टेट (आईएस जाे पहले आइएसआईएस के नाम से जाना जाता था) यकायक अमेरिका का सबसे बड़ा दुश्‍मन बन गया है। अभी ज्‍़यादा दिन नहीं हुए जब यह बर्बर आतंकवादी संगठन अमेरिका तथा अरब जगत के उसके पिट्ठुओं द्वारा दी गयी सैन्‍य और आर्थिक मदद से सीरिया में बशर अल-असद सरकार के खिलाफ़ जेहाद कर रहा था। तब वह ”अच्‍छा” जेहादी था क्‍योंकि वह अमेरिका के हितों के अनुकूल काम कर रहा था। अब चूंकि वह अमेरिका के हितों के खिलाफ़ काम करने लगा है इसलिए वह एक बुरा जेहादी हो गया है। आईएस के इतिहास से वाकिफ़ कोई भी व्‍यक्ति यह जानता है कि यह भस्‍मासुर इराक़ में 2003 के अमेरिकी हमले के बाद पैदा हुआ और सीरिया में 2011 के बाद से जारी गृहयुद्ध में अमेरिका द्वारा पोषित किया गया है। लेकिन आईएस जैसे बर्बर इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन की अमेरिकी साम्राज्यवादी नीतियों द्वारा पैदाइश और उनका पालन-पोषण कोई नयी बात नहीं है। अमेरिकी विदेश नीति द्वारा ऐसे भस्‍मासुरों को पैदा करने को का बहुत लंबा इतिहास रहा है।

दरअसल द्वितीय विश्वयुद्ध के तुरन्‍त बाद ही कम्युनिज़्म और धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद को मात देने के लिए अमेरका ने इस्लामिक दक्षिणपंथ के साथ गठजोड़ बनाने का एलान कर दिया था जिसकी वजह से समय-समय पर वहाँ ऐसे इस्लामिक कट्टरपंथी संगठन उभरते रहे हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले ही अरब और समूचे मध्यपूर्व में तेल के कुओं की खोज हो चुकी थी। इस युद्ध से पहले ही सउदी अरब के सुल्तान इबू बिन सउद के साथ अमेरिका के घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे। सउदी अरब में 1938 में तेल की खोज हो जाने के बाद से ये सम्बन्ध और प्रगाढ़ होते गये। ग़ौरतलब है कि पूरी दुनिया में तेजी से फैल रही वहाबी-सलाफ़ी-तकफ़ीरी नामक इस्लामिक कट्टरपंथी धाराओं की जन्मस्थली सउदी अरब ही है। सउदी अरब के तेल से अर्जित अकूत धन का इस्‍तेमाल वहां के शेख और शाह विलासिता भरी जिन्‍दगी जीने और दुनिया भर में वहाबीवाद की हवा फैलाने में करते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के ठीक बाद प्रस्तुत की गयी ‘‘ट्रूमैन डॉक्ट्रिन’’ के तहत अमेरिका ने इस्लामिक दक्षिणपंथ की हवा बहाने की नीति को औपचारिक जामा पहनाया गया। इसके तहत अरब के शाहों एवं शेखों की सत्ताओं को अपना सहयोगी घोषित किया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति आइज़ेनहावर ने इसी नीति के तहत मुस्लिम ब्रदरहुड को व्हाइट हाउस के हॉल में आमंत्रित किया। 1967 के अरब-इज़रायल युद्ध के बाद अरब के देशों में धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद की धारा कमज़ोर पड़ने लगी और दक्षिणपंथी इस्लामिक कट्टरपंथी धारा समूचे मध्यपूर्व में अपना दबदबा बनाने में क़ामयाब हुई।

उदारवादी माने जाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के दौर में अफ़गानिस्तान की वामपंथी सरकार का तख़्तापलट करने के लिए एवं सोवियत साम्राज्यवादी हस्तक्षेप का मुक़ाबला करने के लिए मुज़ाहिद्दीनों को हथियारों और मुद्रा की सप्लाई की गयी एवं उन्‍हें सैन्‍य प्रशिक्षण दिया गया। कार्टर के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेंस्की ने 1979 में अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा से लगे खैबर दर्रे का दौरा किया और एक हाथ में कुरान और दूसरे हाथ में बन्दूक लेकर वहाँ के जेहादियों को संबोधित किया कि यही उन्हें मुक्ति दिला सकते हैं। यही नहीं पाकिस्तान के तानाशाह जियाउल हक़ और वहाँ की खु़फ़ि‍या एजेंसी आईएसआई के इस्लामीकरण की परियोजना को अफ़गानी मुजाहिद्दीनों के जेहाद से जोड़कर अफ़गानिस्तान और पाकिस्तान में इस्लामिक कट्टरपंथ की ज़मीन पुख़्ता की गयी। हद तो तब हो गयी जब अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने अफ़गानी मुजाहिद्दीनों को व्हाइट हाउस में ससम्मान आमंत्रित किया और उनको संबोधित करते हुए कहा कि वे नैतिक रूप से अमेरिका की स्थापना करने वाले वाशिंगटन और जैफ़रसन जैसे नेताओं के समतुल्य हैं। रीगन ने मुजाहिद्दीनों के जेहाद को इतना महत्वपूर्ण माना कि उस समय लांच होने वाले अमेरिकी अंतरिक्षयान कोलंबिया को अफ़गानियों के संघर्ष के नाम समर्पित कर डाला।

यह बात अब किसी से छिपी नहीं है कि अल-क़ायदा, तालिबान और ओसामा बिन लादेन अफ़गानिस्तान में अमेरिका द्वारा पोषित भस्मासुर थे जो बाद में अपने आका को ही अपना निशाना बनाने लगे। यहाँ तक कि सद्दाम हुसैन को भी अमेरिका ने इराक-इरान युद्ध में सहयोग दिया। बाद में सद्दाम हुसैन भी अमेरिका का दुश्मन हो गया क्योंकि वह कुवैत के तेल के कुओं से अमेरिकी पिट्ठुयों का नियंत्रण हटाकर उनको अपने क़ब्जे़ में करना चाहता था।

2003 में इराक़ में अमेरिकी हमले के वक़्त अमेरिका के नव-रूढ़िवादियों की दीर्घकालिक योजना यह थी कि शिया-सुन्‍नी के संकीर्ण पंथों कट्टरपंथियों को भड़काकर एवं कुर्द जैसे नृजातीय समुदाय में अलगाववाद की हवा देकर इराक़ सहित समूचे अरब जगत के नक़्शे को अपनी सहूलियत से पुनः खींचा जाये। जैसा कि मध्यपूर्व क्षेत्र के विश्लेषक एजाज़ अहमद ने इंगित किया है कि उनकी 30 साल की उस योजना में अभी मात्र 11 वर्ष हुए हैं। यह बात दीग़र है कि कभी-कभी हालात साम्राज्यवादियों के काबू से बाहर हो जाते हैं और योजनाबद्ध तरीके से पैदा किये गये भस्मासुर अपने आका को ही काट खाने दौड़ने लगते हैं। एेसे में एक बार फिर से आतंकवाद का हौव्‍वा खड़ाकर सैन्‍य कार्रवाई करके समस्‍या का समाधान करने की कवायदें की जाती हैं। इस तरह पूरी दुनिया का सैन्‍यीकरण बढ़ता है और हथ‍ियारों का ध्‍ांधा करने वाली कंपनियों की चांदी हो जाती है। यही इस समय इराक़ में हो रहा है।

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