लेखक, कलाकार को बर्बरता का प्रतिरोध करना होगा: मंगलेश डबराल

April 22nd, 2015  |  Published in प्रतिरोध/Resistance, Featured

‘फासीवाद के साहित्यिक-सांस्‍कृतिक प्रतिरोध के ऐतिहासिक अनुभव, उनका वैचारिक परिप्रेक्ष्‍य और समकालीन सन्‍दर्भ’ विषय पर 13 मार्च को दिल्‍ली में हुई ‘अन्‍वेषा’ की पहली विचार-गोष्‍ठी की अध्‍यक्षता कर रहे वरिष्‍ठ कवि मंगलेश डबराल का वक्‍तव्‍य

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मेरे पास कहने के लिए ज्‍यादा कुछ नहीं है। बस इतना ही कि सन् 1925 में जब आरएसएस की स्‍थापना हुई तभी से इस देश में फासीवाद की जमीन बनायी जा रही थी और नरेन्‍द्र मोदी के सत्‍ता में आने के बाद उसे एक सब्‍जेक्टिव फोर्स मिली। यह आश्‍चर्य की बात नहीं कि मोदी कीजीत के बाद आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवन ने कहा था कि हमारा समय आ गया है। आवर टाइम हैज़ कम। तो यह अनुकूल समय उनके लिए है… तभी हमें फासिज़्म के… सामाजिक-सांस्‍कृतिक फासिज़्म के इस तरह के रूप इस तरह देखने को मिल रहे हैं कि हम क्‍या खायें, क्‍या पहने और क्‍या ओढ़े, हम मीट न खायें, हमारी लड़कियां इस तरह के कपड़े न पहनें और रात में न निकलें नहीं तो उनसे बलात्‍कार हो जायेगा। इस तरह की बहुत सारी घटनायें हैं, इस पर उनके जिस तरह के बयान आते हैं, या कोई घटना हो जाती है, इस तरह से यह क्रम चलता जा रहा है, बढ़ता जा रहा है। और यह लगातार बढ़ता जायेगा क्‍योंकि संघ परिवार के जो और भी संगठन है वह भी अपने हिस्‍से के मांस की की मांग करेंगे। तो इस तरह की मांगें उठती हैं और हो सकता है कि इस देश के पूंजीपतियों के सहयोग से हम राजनीतिक-आर्थिक फासिज़्म की स्थिति तक पहुंच जायें। अभी फिलहाल वे यहां तक सीमित हैं कि हम क्‍या सुनें, क्‍या देखें, किसको वोट दें, कहां जायें और हम कौन सी किताब खरीदें, क्‍या पढ़ें और क्‍या न पढ़ें। हम वेंडी डोनिंगर की किताब न पढ़ें उस पर हम प्रतिबंध लगा देंगे,या दीनानाथ बत्रा की किताबों को कोर्स में लगवा देंगे और उन्‍हें पढ़ना पड़ेगा। इस तरह की चीजें बढ़ती ही जायेंगी और इस तरह की बहुत सारी चीजें इन संगठनों से आती रहती हैं। इस तरह की बहुत सारी बातें लोगों के मन में हैं कि कभी भी कोई उपद्रव हो सकता है कोई उत्‍पात हो सकता है। या आरएसएस कुछ करवा सकता है।

ऐसे में सांस्‍कृतिक फासिज़्म का प्रतिरोध किस तरह से किया जाये। मुझे लगता है कि साहित्‍य का एक ज़रूरी और बड़ा काम है प्रतिरोध करना। रघुवीर सहाय हमकहा करते थे कि सत्‍ता और साहित्‍य का हमेशा छत्तीस का ही आंकड़ा हो सकता है। उसको आगे बढ़ाकर कहा जा सकता है कि वह हमेशा प्रतिरोध करता है। आज जो अंतरराष्‍ट्रीय स्थिति है और हमारे देश की स्थिति है वह यह है कि एक लेखक को, एक कलाकार को ताक़त का प्रतिरोध करना होगा, सत्‍ता का प्रतिरोध करना होगा, बर्बरता का प्रतिरोध करना होगा, सांस्‍कृतिक वर्चस्‍व की जो भी घटनायें हो रही हैं उसका प्रतिरोध करना होगा और दमन का भी प्रतिरोध करना होगा। तो इतने मोर्चे हैं जिन पर हमें प्रतिरोध करना होगा। इतनी सारे चीजों पर तो हमें प्रतिरोध करना ही होगा। लेकिन यह प्रतिरोध कैसे हो। लेकिन जितने भी हमारे वाम के संगठन हैं वह सब प्रतिरोध करना चाहते हैं। लेकिन इसके बावजूद स्थिति ऐसी है कि छिटपुट इस तरह के आयोजनों, अभियानों, या कार्यक्रमों से ऐसा कोई देशव्‍यापी आंदोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है। इसकी वजह भी हमारी वाम पार्टियों में ही है, वाम संगठनों में है। क्‍योंकि जब तक एक संयुक्‍त मोर्चा नहीं बनेगा जिसमें वैचारिक रूप से वामपंथ, वामपंथ के लोग और वामपंथ से बाहर के लोग भी जो सेकुलर डेमोक्रेटिक हैं, वे भी जो सम्‍पन्‍न हैं और वे लोग भी जो कि तलछट में रहते हैं जिनका कि राजनीतिक चरित्र नहीं है जो कि बेरोजगार हैं, गैर-सांगठनिक लोग हैं, यहां तक कि जो लोअर डेप्‍थ्स में रहते हैं, जैसे कि नवारुण भट्टाचार्य ने अपने उपन्‍यास में तलछट में रहने वाले लोगों की राजनीतिक चेतना को उभारा था… तो जब इस तरह के लोग शामिल नहीं होंगे तो यह अभियान कामयाब नहीं होगा। इसलिए भी कि इस समय जो साहित्यिक वातावरण है वह काफी अराजनीतिक हैं। यह भी एक कारण है कि इस समय हिंदी का शायद कोई भी कवि यहां नहीं आया है। जो युवा कवि हैं, लेखक हैं जो हिंदी में इस समय बहुत हैं, दिल्‍ली में तो बहुत ज्‍यादा हैं, मगर एक अराजनीतिक माहौल इस समय है। और जैसा दिख रहा है यह और भी एपोलिटिकल होता जाएगा। तो यह बहुत मुश्किल है कि ऐसे में यह सब काम कैसे होंगे। जब तक एक ब्रॉड लेफ्टिस्‍ट कल्‍चरल फ्रंट नहीं बनता है जो कि बनेगा।

जर्मनी में, शायद जर्मनी में उतना नहीं, फ्रांस में, इटली में और स्‍पेन में तो बहुत ज्‍यादा प्रतिरोध हुआ, वहां क्‍लैंडेस्‍टाइन मैग्‍ज़ीन्‍स भी निकलीं। तो दुनिया के जिन लेखकों, कलाकारों ने इतना झेला है इतनी बर्बरताएं झेलीं हैं चाहे वह नाजियों के अंडर में हों, चाहे स्‍पेन के फ्रांकों के अंडर में हों, या एक हद तक इटली के हों क्‍योंकि इटली का फासिज़्म उस तरह का नहीं था जैसे कि नात्सियों का फासिज़्म था, उससे काफी अलग था। इसलिए वहां विरोध भी उतना अधिक नहीं हुआ। खैर वो एक अलग बात है। स्‍पेन में तो सैकड़ों कवि थे जिन्‍होंने फ्रैंको के ख़ि‍लाफ़ लड़ाई लड़ी चाहे चाहे वो लोर्का हों, अंतोनियो मशादो हों, अल्‍बेर्ती हों, मिगेल हेर्नान्‍देस हों, सेसर वायेखो हों, निकोलस गियेन हों, इस तरह के तमाम कवि रहे हैं जैसे अभी इन्‍होंने (लता) गिनाये, तो यह बहुत बड़ा इतिहास रहा है और उन्‍होंने बहुत-बहुत लड़ाइयां लड़ी हैं। जर्मनी में तो बहुत से लेखक भाग गये, कलाकार भाग गये, सैकड़ों कलाकार भाग गये, कई अमेरिका चले गये, कई दार्शनिकों ने आत्‍महत्‍या कर ली, लगभग 25,000 पेंटिंग्‍स जलाई गईं, 80,000 किताबें जलाई गईं। 1933 से लेकर 1940 तक यह सिलसिला चलता रहा। ब्रेष्‍ट भागकर अमेरिका चले गये, वाल्‍टर बेंजामिन ने आत्‍महत्‍या कर ली। तो इस तरह से बहुत लोग थे जिन्‍होंने बहुत सारी कुर्बानियां दीं। इतनी बर्बरता तो हम लोग शायद कभी नहीं झेल सकते। हम लोगों को तो पढ़कर ही सिहरन होती है। यह एक बहुत लम्‍बा इतिहास है। और बहुत गौरवशाली इतिहास है। एरिक हॉब्‍सबॉम ने अपनी एक किताब में लिखा है, स्‍पेनिश सिविल वार के बारे में, कि जो लोग जीते, उन लोगों की जो तलवार की ताकत थी, उनके मुकाबले अपने-अपने कलम, ब्रश, कैमरा और फिल्‍म को लेकर जो लोग लड़े उनकी ताक़त कहीं ज़्यादा बड़ी है। तो मुझे लगता है कि इस बारे में बहुत पुनर्विचार करने की जरूरत है कि हम इस तरह का साझा रणनीतिक मोर्चा कैसे बनायें। अपनी-अपनी पार्टी प्रतिबद्धताओं से ही यह नहीं हो पायेगा। हमारे यहां जो एंटी-फासिस्‍ट साझा परंपरा है, उसे आगे बढ़ाना होगा। इसके बारे में हमें नये सिरे से सोचना पड़ेगा।

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