नकुल सिंह साहनी की चर्चित डाॅक्युमेंट्री फिल्म ‘मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है…’ का प्रदर्शन

June 10th, 2015  |  Published in प्रेस विज्ञप्ति/Press Release

 

साहित्‍य-कला-संस्‍कृति, समाज और मीडिया पर केन्द्रित सृजन और संवाद के जनपक्षधर मंच ‘अन्‍वेषा’ की ओर से 13 जून को युवा फिल्मकार नकुल सिंह साहनी की चर्चित डाॅक्युमेंट्री फिल्म ‘मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है…’ का प्रदर्शन और बातचीत का आयोजन किया जा रहा है।
स्‍थान : उर्दू घर, 212, राउज़ एवेन्‍यू, नई दिल्‍ली-2 (आईटीओ, गांधी शांति प्रतिष्‍ठान के सामने)
तिथि : 13 जून 2015; समय : अपराह्न 3 बजे
Screening of the much talked about documentary film Muzaffarnagar Baaqi Hai- Muzaffarnagar Eventually by young filmmaker Nakul Singh Sawhney followed by a discussion.
Venue: Urdu Ghar, 212, Rouse Avenue, New Delhi -2 ( Opposite: ITO, Gandhi Peace Foundation)
Date: 13 June 2015; Time 3 pm


फिल्‍म के बारे में : सितम्‍बर 2013 में, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़ि‍ले आज़ादी के बाद से देश में मुसलमानों के सबसे भयानक क़त्‍लेआम में से एक के गवाह बने। 100 से ज़्यादा लोग मारे गये और क़रीब 80,000 लोग अपने घरों-गाँवों से उजाड़ दिये गये। अतीत में, इन दो ज़ि‍लों में मुसलमान और हिन्‍दू सौहार्द और मेलजोल के माहौल में रहते आये थे। फिर इस बार ऐसा क्‍या हुआ?

‘मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है…’ हिंसा में शामिल या उससे प्रभावित रहे इलाक़े के अनेक सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक पहलुओं और उनकी गतिकी को समेटती है।

फ़ि‍ल्‍म कई तबक़ों के लोगों से बात करती है। वहाँ हुई हिंसा और इसके असर से होने वाली घटनाओं पर नज़र डालने के साथ ही, यह क़त्‍लेआम से जुड़े अनेक पहलुओं से गुज़रती है – स्त्रि‍यों की ‘इज़्ज़त’ का सवाल जिसे लोगों को उकसाने का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया गया, भाजपा-आरएसएस सहित हिन्‍दू राष्‍ट्रवादी संगठनों द्वारा खेला गया साम्‍प्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल, जातीय पहचान की राजनीति को हिन्‍दुत्‍व के बड़े घेरे में समेटा जाना और एक ज़माने में इस इलाक़े में ताक़तवर रही भारतीय किसान यूनियन का ध्‍वस्‍त होना, जिसका अस्तित्‍व हिन्‍दू और मुसलमान किसानों की एकता पर ही टिका था। फ़ि‍ल्‍म इन ज़ि‍लों में दलित राजनीति के विभिन्‍न पहलुओं और दंगों के समय उत्‍तर प्रदेश में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी की सन्दिग्‍ध भूमिका की भी पड़ताल करती है। इस सबका नतीजा आज यह हुआ है कि मुस्लिम समुदाय अपने आप को बिल्‍कुल अलग-थलग और हाशिये पर धकेल दिया गया महसूस कर रहा है।

ये सभी पहलू 2014 में भारत में हुए आम चुनाव के प्रचार अभियान के दौरान एक-दूसरे से गुँथ जाते हैं। फ़ि‍ल्‍म यह भी देखती है कि मुज़फ़्फ़रनगर के क़त्‍लेआम की प्रतिध्‍वनि इन चुनावों के दौरान कैसे होती है।

लेकिन दर्द और अँधेरे के इस मंज़र के बीच फ़ि‍ल्‍म कॉरपोरेट-साम्‍प्रदायिक गँठजोड़ के ख़ि‍लाफ़ मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़ि‍लों में जारी प्रतिरोध की कहानी भी बयाँ करती है।

मुज़फ़्फ़रनगर और शामली ज़ि‍लों ने अभी तक तो हार नहीं मानी है लेकिन क्‍या हम आने वाले वक़्त में भी कह पायेंगे… मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है?

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