राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: भारतीय फ़ासीवादियों की असली जन्मकुण्डली

September 13th, 2009  |  Published in इतिहास/History, भारत में फ़ासीवाद/Fascism in India, Uncategorized  |  9 Comments

भारत में फ़ासीवाद का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितना कि जर्मनी और इटली में। जर्मनी और इटली में फ़ासीवादी पार्टियाँ 1910 के दशक के अन्त या 1920 के दशक की शुरुआत में बनीं। भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे केशव बलिराम हेडगेवार। हेडगेवार जिस व्यक्ति के प्रभाव में फ़ासीवादी विचारों के सम्पर्क में आये थे वह था मुंजे। मुंजे 1931 में इटली गया था और वहाँ उसने मुसोलिनी से भी मुलाक़ात की थी। 1924 से 1935 के बीच आर.एस.एस. से क़रीबी रखने वाले अख़बार केसरीने मुसोलिनी और उसकी फ़ासीवादी सत्ता की प्रशंसा में लगातार लेख छापे। मुंजे ने हेडगेवार को मुसोलिनी द्वारा युवाओं के दिमाग़ों में ज़हर घोलकर उन्हें फ़ासीवादी संगठन में शामिल करने के तौर-तरीक़ों के बारे में बताया। हेडगेवार ने उन तौर-तरीक़ों का इस्तेमाल उसी समय से शुरू कर दिया और आर.एस.एस. आज भी उन्हीं तरीक़ों का इस्तेमाल करती है। 1930 के दशक के अन्त तक भारतीय फ़ासीवादियों ने बम्बई में उपस्थित इतालवी कांसुलेट से भी सम्पर्क स्थापित कर लिया। वहाँ मौजूद इतालवी फ़ासीवादियों ने हिन्दू फ़ासीवादियों से सम्पर्क क़ायम रखा।

लगभग इसी समय एक अन्य हिन्दू कट्टरपन्थी विनायक दामोदर सावरकर, जिनके बड़े भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक थे, ने जर्मनी के नात्सियों से सम्पर्क स्थापित किया। सावरकर ने जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों के सफ़ाये को सही ठहराया और भारत में मुसलमानों की ”समस्या” के समाधान का भी यही रास्ता सुझाया। जर्मनी में यहूदी प्रश्नका अन्तिम समाधानसावरकर के लिए एक मॉडल था। सावरकर के लिए नात्सी राष्ट्रवादी थे जबकि यहूदी राष्ट्र-विरोधी और साम्प्रदायिक। लेनिन ने बहुत पहले ही आगाह किया था कि नस्लवादी अन्धराष्ट्रवादी पागलपन अक्सर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का चोला पहनकर आ सकता है। भारत में हिन्दू साम्प्रदायिक अन्धराष्ट्रवाद भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जामा पहनकर ही सामने आ रहा था।


आर.एस.एस. ने भी खुले तौर पर जर्मनी में नात्सियों द्वारा यहूदियों के कत्ले-आम का समर्थन किया। हेडगेवार ने मृत्यु से पहले गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गोलवलकर ने अपनी पुस्तक वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्डऔर बाद में प्रकाशित हुई बंच ऑफ़ थॉट्समें जर्मनी में नात्सियों द्वारा उठाये गये क़दमों का अनुमोदन किया था। गोलवलकर आर.एस.एस. के लोगों के लिए सर्वाधिक पूजनीय सरसंघचालक थे। उन्हें आदर से संघ के लोग गुरुजीकहते थे। गोलवलकर ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मेडिकल की पढ़ाई की और उसके बाद कुछ समय के लिए वहाँ पढ़ाया भी। इसी समय उन्हेंगुरुजीनाम मिला। हेडगेवार के कहने पर गोलवलकर ने संघ की सदस्यता ली और कुछ समय तक संघ में काम किया। अपने धार्मिक रुझान के कारण गोलवलकर कुछ समय के लिए आर.एस.एस. से चले गये और किसी गुरु के मातहत संन्यास रखा। इसके बाद 1939 के क़रीब गोलवलकर फिर से आर.एस.एस. में वापस आये। इस समय तक हेडगेवार अपनी मृत्युशैया पर थे और उन्होंने गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। 1940 से लेकर 1973 तक गोलवलकर आर.एस.एस. के सुप्रीमो रहे।

गोलवलकर के नेतृत्व में ही आर.एस.एस. के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें आज हम जानते हैं। आर.एस.एस. ने इसी दौरान अपने स्कूलों का नेटवर्क देश भर में पफैलाया। संघ की शाखाएँ भी बड़े पैमाने पर इसी दौरान पूरे देश में पफैलीं। विश्व हिन्दू परिषद जैसे आर.एस.एस. के आनुषंगिक संगठन इसी दौरान बने। गोलवलकर ने ही आर.एस.एस. की फ़ासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया और उनके नेतृत्व में ही आर.एस.एस. की पहुँच महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से बाहर तक गयी। आर.एस.एस. सही मायनों में एक अखिल भारतीय संगठन गोलवलकर के नेतृत्व में ही बना। यही कारण है कि गोलवलकर आज भी संघ के लोगों में सबसे आदरणीय माने जाते हैं और अभी दो वर्ष पहले ही संघियों ने देश भर में उनकी जन्मशताब्दी मनायी थी।

आर.एस.एस. ने अंग्रेज़ों के खि़लाफ़ किसी भी स्वतन्‍त्रता संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। संघ हमेशा ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के साथ तालमेल करने के लिए तैयार था। उनका निशाना शुरू से ही मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई थे। लेकिन ब्रिटिश शासक कभी भी उनके निशाने पर नहीं थे। भारत छोड़ो आन्दोलनके दौरान संघ देशव्यापी उथल-पुथल में शामिल नहीं हुआ था। उल्टे जगह-जगह उसने इस आन्दोलन का बहिष्कार किया और अंग्रेज़ों का साथ दिया था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बंगाल में अंग्रेज़ों के पक्ष में खुलकर बोलना इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण था। ग़लती से अगर कोई संघ का व्यक्ति अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ा गया या गिरफ्ऱतार किया गया तो हर बार उसने माफीनामा लिखते हुए ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफ़ादारी को दोहराया और हमेशा वफ़ादार रहने का वायदा किया। स्वयं पूर्व प्रधानमन्‍त्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी यह काम किया। ऐसे संघियों की फ़ेहरिस्त काफ़ी लम्बी है जो माफ़ीनामे लिख-लिखकर ब्रिटिश जेलों से बाहर आये और जिन्होंने भारतीय स्वतन्‍त्रता-संग्राम सेनानियों के खि़लाफ़ अंग्रेज़ों से मुख़बिरी करने का घिनौना काम तक किया। ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज्य ने भी इसी वफ़ादारी का बदला चुकाया और हिन्दु साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों को कभी भी निशाना नहीं बनाया। संघ आज राष्ट्रवादी होने का चाहे जितना गुण गा ले वह स्वतन्‍त्रता आन्दोलन में शामिल न होने और अंग्रेज़ों का साथ देने का दाग़ अपने दामन से कभी नहीं मिटा सकता है। इतिहास को फिर से लिखने के संघ के प्रयासों के पीछे का मुख्य कारण यही है। वे अपने ही इतिहास से डरते हैं। वे जानते हैं कि उनका इतिहास ग़द्दारियों और कायरताओं का एक काला इतिहास रहा है। हिंसा से उनको बहुत प्रेम है, लेकिन झुण्ड में पौरुष प्रदर्शन वाली हिंसा से। वे कभी किसी जनान्दोलन में शामिल नहीं हुए और उनमें किसी दमन को झेलने की ताक़त नहीं है। हमेशा सत्ता के साथ नाभिनालबद्ध रहते हुए व्यवस्था के खि़लाफ़ लड़ने वालों पर कायराना हिंस्र हमले करना इनकी फितरत रही है। चाहे वे मुसलमान रहे हों, ईसाई या फिर कोई भी राजनीतिक विरोधी। बहादुराना संघर्ष से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा है, कभी नहीं।

संघ का पूरा ढाँचा शुरू से ही फ़ासीवादी रहा था। यह लम्बे समय तक सिप़र्फ पुरुषों के लिए ही खुला था। संघ की महिला शाखा बहुत बाद में बनायी गयी। संघ का पूरा आन्तरिक ढाँचा हिटलर और मुसोलिनी की पार्टियों से हूबहू मेल खाता है। हर सदस्य यह शपथ लेता है कि वह सरसंघचालक के हर आदेश का बिना सवाल किये पालन करेगा। सरसंघचालक सबसे ऊपर होता है और उसके नीचे एक सरकार्यवाह होता है जिसे सरसंघचालक ही नियुक्त करता है। एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल होता है जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है। अपना उत्तराधिकारी भी सरसंघचालक चुनता है। यानी पूरी तरह एक कमाण्ड स्ट्रक्चरजिसमें जनवाद की कोई जगह नहीं है। नात्सी और फ़ासीवादी पार्टी का पूरा ढाँचा इसी प्रकार का था। नात्सी पार्टी में फ्ऱयूहररके नाम पर शपथ ली जाती थी और फ़ासीवादी पार्टी में ड्यूसके नाम पर शपथ ली जाती थी।

यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह हमेशा से सिपर्फ़ हिन्दुओं के लिए खुला रहा है। यह खुले तौर पर कहता है कि यह हिन्दुओं के हितों की सेवा करने के लिए है। संघ ने कभी भी निचली जातियों या निचले वर्गों के हिन्दुओं के लिए कोई काम नहीं किया है। इनका समर्थन भी हमेशा से उजड़े टुटपुँजिया पूँजीपति वर्ग, नवधनाढ्यों और लम्पट सर्वहारा के बीच रहा है। संघ के सामाजिक आधार पर हम आगे आयेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में फ़ासीवाद का अपना मौलिक संस्करण तैयार किया। इसकी हिटलर और मुसोलिनी के फ़ासीवाद से काफ़ी समानताएँ थीं और उनसे इन्होंने काफ़ी कुछ सीखा। गोलवलकर अपनी पुस्तक वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्डमें लिखते हैं- आज दुनिया की नज़रों में सबसे ज़्यादा जो दूसरा राष्ट्र है, वह है जर्मनी। यह राष्ट्रवाद का बहुत ज्वलन्त उदाहरण है। आधुनिक जर्मनी कर्मरत है तथा जिस कार्य में वह लगा हुआ है, उसे काफ़ी हद तक उसने हासिल भी कर लिया है… पितृभूमि के प्रति जर्मन गर्वबोध, जिसके प्रति उस जाति का परम्परागत लगाव रहा है, सच्ची राष्ट्रीयता का ज़रूरी तत्व है। आज वह राष्ट्रीयता जाग उठी है तथा उसने नये सिरे से विश्वयुद्ध छेड़ने का जोखिम उठाते हुए अपने फ्पुरखों के क्षेत्राय् पर एकजुट, अतुलनीय, विवादहीन, जर्मन साम्राज्य की स्थापना करने की ठान ली है।…” (गोलवलकर, ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफ़ाइण्ड, पृ. 34-35)

गोलवलकर ने इसी पुस्तक में यहूदियों के क़त्लेआम का भरपूर समर्थन किया और इसे भारत के लिए एक सबक़ मानते हुए लिखा…अपनी जाति और संस्कृति की शुद्धता बनाये रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों-यहूदियों का सफ़ाया करके विश्व को चैंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहाँ अपने सर्वोच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फ़र्क हों, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता। हिन्दुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक़ है।” (गोलवलकर, वही, पृ. 35)। हिटलर की इसी सोच को गोलवलकर भारत पर लागू कैसे करते हैं, देखिये: …जाति और संस्कृति की प्रशंसा के अलावा मन में कोई और विचार न लाना होगा, अर्थात हिन्दू राष्ट्रीय बन जाना होगा और हिन्दू जाति में मिलकर अपने स्वतन्‍त्र अस्तित्व को गँवा देना होगा, या इस देश में पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र की गु़लामी करते हुए, बिना कोई माँग किये, बिना किसी प्रकार का विशेषाधिकार माँगे, विशेष व्यवहार की कामना करने की तो उम्मीद ही न करेंऋ यहाँ तक कि बिना नागरिकता के अधिकार के रहना होगा। उनके लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं। हमें उन विदेशी जातियों से जो हमारे देश में रह रही हैं उसी प्रकार निपटना चाहिए जैसे कि प्राचीन राष्ट्र विदेशी नस्लों से निपटा करते हैं।” (गोलवलकर, वही, पृ. 47-48) बात बिल्कुल साफ़ है। मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति संघ के विचार वही हैं जो यहूदियों के प्रति हिटलर के थे।

संघ का राष्ट्र कौन है? हिन्दू, लेकिन सारे हिन्दू नहीं। उच्च जाति के पुरुष हिन्दू। स्त्रिायों को हिटलर और मुसोलिनी के समान ही पुरुष का सेवक और स्वस्थ बच्चे पैदा करने के यन्‍त्र से अधिक और कुछ नहीं माना गया है। दूसरी बात, वे हिन्दू जिनके पास समाज के संसाधनों का मालिकाना है। मज़दूर वर्ग का काम है कि महान प्राचीन हिन्दू राष्ट्र की उन्नति और प्रगति के लिए बिना सवाल उठाये खटते रहें-12 घण्टे और कभी-कभी तो 14-15 घण्टे तक। इस पर सवाल खड़े करना या श्रमिक अधिकारों की बात करना राष्ट्र-विरोधी माना जाएगा। हर कोई अपना कर्मकरे, सवाल नहीं! कर्म आपके जन्म से तय होता है। आप जहाँ जिस घर में, जिस परिवार में जन्मे आपको वैसा ही कर्म करना है। या फिर जैसा आपके राष्ट्र, धर्म और जाति का नेता आपसे कहे! प्रतिरोध, विरोध और प्रश्न राष्ट्रद्रोह है! श्रद्धा-भाव से कर्म कीजिये! मज़दूरों का यही धर्म है कि वे राष्ट्र प्रगतिमें अपना हाड़-मांस गला डालें! बताने की ज़रूरत नहीं है कि संघ और भाजपा के लिए राष्ट्र का अर्थ है पूँजीपतियों, दुकानदारों, टुटपूँजियों की बिरादरी। जब ये मुनाफ़ाखोर तरक़्की करते हैं और मुनाफ़ा कमाते हैं तो ही राष्ट्र तरक़्की करता है। हिटलर और मुसोलिनी ने भी अपने-अपने देशों में मज़दूरों के प्रति यही रुख़ अपनाया था। इन देशों में फ़ासीवादी सत्ताएँ आने के साथ ही ट्रेड यूनियनों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। ट्रेड यूनियन आन्दोलन पर हिंस्र हमले इटली और जर्मनी में फ़ासीवादियों की गुण्डा फ़ौजों ने तब भी किये जब वे सत्ता में नहीं थे। मुम्बई में ट्रेड यूनियन नेताओं, मज़दूरों और उनकी हड़तालों पर ऐसे ही हमले शिव सेना (जिसका फ़ासीवाद प्रेम जगजाहिर है) ने भी किये थे। देश भर में जगह-जगह बजरंग दल और विहिप के गुण्डों ने समय-समय पर पूँजीपतियों के पक्ष से मज़दूरों, उनके नेताओं और हड़तालों को तोड़ने का काम किया है। जब वे इस किस्म की आतंकवादी कार्रवाइयाँ नहीं कर रहे होते हैं तो वे मज़दूरों की वर्ग एकता को तोड़ने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। मिसाल के तौर पर, मज़दूरों के बीच ऐसे संगठन बनाये जाते हैं जो मज़दूरों की दुर्दशा के लिए पूँजीपति वर्ग को ज़िम्मेदार नहीं ठहराते। पूँजीपतियों से ख़ैरात लेकर और साथ ही मज़दूरों के बीच से पैसे जुटाकर फ़ण्ड पूलबनाये जाते हैं जो मज़दूरों को बेरोज़गारी और भुखमरी की हालत में कुछ पैसे दे देता है।

कई बार ये पैसे सूद पर भी दिये जाते हैं। इसके अतिरिक्त, धार्मिक अवसरों पर मज़दूरों के बीच पूजा आदि करवाना, कीर्तन करवाना-ये ऐसे संगठनों का मुख्य काम होता है। साथ ही मज़दूरों के दिमाग़ में यह बात भरी जाती है कि उनके हालात के ज़िम्मेदार अल्पसंख्यक हैं जो उनके रोज़गार आदि के अवसर छीन रहे हैं। इन फ़ासीवादी संगठनों के नेताओं के मुँह से अक्सर ऐसी बात सुनने को मिल जाती है- 17 करोड़ मुसलमान मतलब 17 करोड़ हिन्दू बेरोज़गार।” यह बरबस ही फ्रांस के फ़ासीवादी नेता मेरी लॉ पेन के उस कथन की याद दिलाता है जिसमें उसने कहा था- ”दस लाख प्रवासी मतलब दस लाख फ्रांसीसी बेरोज़गार।” मज़दूरों के बीच सुधार के कार्य करते हुए ये संघी संगठन मज़दूरों की वर्ग चेतना को भोथरा बनाने का काम करते हैं।

वे उन्हें हिन्दू मज़दूर के तौर पर संगठित करने की कोशिश करते हैं। और इस प्रकार वे मज़दूरों की वर्ग एकता को तोड़ते हैं। साथ ही, ‘कमेटीडालने (सूद पर पैसा देने वाली एक संस्था जिसे संघी संगठन मज़दूरों के पैसे से ही बनाते हैं, जो देखने में आपसी सहकार जैसी लगती है) जैसी गतिविधियों के ज़रिये थोड़ी देर के लिए ही सही, मगर पूँजीपति वर्ग से अन्तरविरोधों को तीख़ा नहीं होने देते। संघ का एक ऐसा ही संगठन है सेवा भारती। साथ ही संघी ट्रेड यूनियन भारतीय मज़दूर संघ अक्सर मुसोलिनी की तर्ज़ पर औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए कारपोरेटवादीसमाधान सुझाती है। इसमें फ़ासीवादी नेतृत्व में एक संघीय निकाय बनाया जाता है जिसमें मज़दूरों और पूँजीपतियों के प्रतिनिधि बैठते हैं।

फ़ासीवादी पार्टी विवादों का निपटारा करती है और ऐसा वह हमेशा पूँजीपतियों के पक्ष में अधिक झुकते हुए करती है। या फिर हिटलर की तरह मज़दूरों पर पूर्ण नियन्‍त्रण के लिए विभिन्न आतंकवादी संगठन बनाने का रास्ता भी आर.एस.एस. हमेशा खोलकर रखता है। बजरंग दल एक ऐसा ही आतंकवादी संगठन है जो हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को असंवैधानिक रास्ते से सड़क पर झुण्ड हिंसा के ज़रिये निपटाने के लिए संघ द्वारा खड़ा किया गया है। यह कम्युनिस्टों, उदारवादियों, साहित्यकारों समेत मज़दूरों और ट्रेड यूनियन प्रतिरोध को गुण्डों और मवालियों के झुण्ड के हिंस्र हमलों द्वारा शान्त करने में यक़ीन करता है। यानी, भारत के फ़ासीवादियों ने जर्मन और इतालवी तरीक़ों का मेल किया है।

संक्षेप में कह सकते हैं कि फ़ासीवादी हमेशा राष्ट्रवाद की ओट में पूँजीपति वर्ग की सेवा करते हैं। राष्ट्र से उनका मतलब पूँजीपति वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग हैं, बाक़ी वर्गों की स्थिति अधीनस्थ होती है और उन्हें उच्च राष्ट्र की सेवा करनी होती है, यही उनका कर्तव्य और दायित्व होता है। प्रतिरोध करने वालों को दैहिक और दैविक ताप से पूर्ण मुक्तिदे दी जाती है। फ़ासीवाद समाज में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए हमेशा ही सड़क पर झुण्डों में की जाने वाली हिंसा का सहारा लेता है। जर्मनी और इटली में भी ऐसा ही हुआ था और भारत में भी संघ ने यही रणनीति अपनायी। संघ के आनुषंगिक संगठन जैसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल अक्सर इस तरीक़े को अपनाते हैं। भोपाल में प्रो. सभरवाल की हत्या इसी का एक उदाहरण था।

9 Responses

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  1. महत्वपूर्ण आलेख है। प्रस्तुति के लिए आभार।

  2. apun bolega says:

    संघ ने आज़ादी के जंग में भाग नहीं लिया , आप जैसे कई लोग तो अटल बिहारी वाजपेई को भी अंग्रेजों के पिट्ठू बताने से नहीं चुकते ! एक बात समझ नहीं आई वो तथाकथित देशद्रोही इस देशका प्रधानमंत्री और फासीवादी पार्टी भाजपा सत्ता में कैसे आई ? वो भी आप जैसे देशभक्तों के रहते ! सत्ता में तो बहुमत से आया जा सकता है तो क्या इस देशओ में अधिकाँश लोग देशद्रोहियों का साथ देते हैं ?
    आज भी देश में संघ से बड़ा कोई संगठन मौजूद नहीं है तो क्या इतने सारे स्वयंसेवक लोग दिमाग से पैदल हैं जो घर-बार छोड़ कर पूर्णकालिक कार्यकर्त्ता के रूप में काम करते हैं ?
    आज़ादी तो कांग्रेसियों ने दिलवा दी ! पर क्या आज का भारत निर्माण की कहानी वहीँ ख़त्म हो जाती है ? नहीं , आज के भारत निर्माण की नीव ही आज़ादी के बाद तैयार कि जाती है / आज़ादी के बाद देश के युवाओं ,छात्रों , देश के लिए कुछ करने वालों के पास कोई लक्ष्य नहीं बचा था तब उस के सामने भारत निर्माण का एक असाधारण लक्ष्य देने का काम किया है संघ ने . आज देश भर में हजारों प्रकल्प चल रहे हैं . जरा देखों :-

    संघ एक सांप्रदायिक संगठन , क्या ये सच है ?

    राष्ट्रीय सेवा भारती के द्वारा देशभर में चलाये जा रहे सेवा कार्योंका एक संख्यात्मक आलेख तथा उल्लेखनीय आयामों का शब्दचित्र पुणे स्थित सेवा वर्धिनी के सहयोग से 1995 में प्रथम बार यह संकलन एक देशव्यापी सर्वेक्षण के आधार पर प्रस्तुत किया गया था।उसके बाद 1997,2004,और अभी 2009 में प्रकाशित ‘सेवा दिशा’,देशभर में फैल रहे सेवाकार्यों की बढो़त्री को नापने का एक अद्भुत प्रयास रहा है। राष्ट्रीय सेवा भारती के साथ-साथ वनवासी कल्याण आश्रम,विश्व हिन्दु परिषद,भारत विकास परिषद,राष्ट्र सेविका समिति,विद्या भारती,दीनदयाल शोध संस्थान,अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद इन संगठनों के द्वारा प्रेरित अलग-अलग सेवा संस्थाओं के सेवा कार्यों को भी इस में संकलित किया जाता है।

    दिनांक 12, 13, 14 जुलाई को मेरठ में सम्पन्न हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रांत प्रचारकों की अखिल भारतीय बैठक में सेवा दिशा 2009 का प्रकाशन किया गया। सेवा दिशा 2009 में प्रकाशित तथ्य यह दर्शाते हैं कि देश के सभी प्रांतों में और दुर्गम क्षेत्रों में निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहें स्वयंसेवकों ने और उनके द्वारा निर्मित स्वयंसेवी संस्थाओं ने सेवाकार्यों के माध्यम से समाज परिवर्तन के लिये एक सशक्त पहल की है।इन सबके द्वारा चलाये गये सेवा के उपक्रमों में 2004 से 2009 तक 1 लाख से भी अधिक कार्यों की वृद्धि हुई है। ये केवल संख्यात्मक वॄद्धि नहीं है। ग्राम आरोग्य के लिए आरोग्य रक्षक योजना,एकल विद्यालयों का शैक्षिक प्रयोग,केरल में चल रहे बाल गोकुलम् की अद्भुत संस्कार क्षमता,महाराष्ट्र में और गुजरात में चल रहा चार सूत्री धान खेती का प्रसार,तामिलनाडु में महिलाओं के स्वयं सहायता समूह,दीप पूजा का कार्यक्रम,व्यसन मुक्ती,दिल्ली में तथा और कुछ शहरों में सड़क पर रहने वाले बच्चों के लिए चलने वाले प्रकल्प,बंगलोर और पुणे में चल रहा युवाओं को सेवा कार्य के लिए प्रेरित करने वाला युवा फॉर सेवा उपक्रम,आंध्र का बाल मजदुरों के लिए शिक्षा का प्रकल्प, आदि ये सभी यही दर्शातें है कि सेवा कार्य के आयाम भी बढ़ रहे हैं,अधिक सर्वस्पर्शी हो रहे हैं तथा उपेक्षित समाज की समस्याओं का जड़ से समाधान करने की दिशा में अग्रसर हो रहे है।इस बैठक में किये गए वृत्त संकलन के अनुसार पूरे देश में शहर और गाँव मिलाकर 6982 स्थानों से 10479 तरूणों ने इस बार संघ के प्रथम वर्ष की शिक्षा ग्रहण की। द्वितीय वर्ष में 2581 तथा तृतीय वर्ष में 923 स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित किया गया। शिक्षार्थियों को शाखा संचालन और शारीरिक कौशल्य के अतिरिक्त ग्राम विकास, आपदा प्रबंधन, नगरी सेवा बस्तियों में सेवा उपक्रम ऐसे विषयों में भी प्रशिक्षित किया गया। प्रतिवर्ष चलने वाले 20 दिन के इन निवासी वर्गों में संघ की प्राथमिक शिक्षा ग्रहण किये हुए स्वयंसेवकों में से चुने हुए स्वयंसेवकों को प्रवेश दिया जाता हैं। मई के प्रारंभ से लेकर जून के अन्त तक चलने वाले यह वर्ग संघ के कार्यकर्ता प्रशिक्षण की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है।इस बैठक में आगामी विजयादशमी से प्रारंभ होने वाली विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा को सफल बनाने हेतू आवश्यक सहयोग की दृष्टि से भी चर्चा की गयी। आगामी 30 सितम्बर को कुरुक्षेत्र से इस यात्रा का शुभारंभ पूज्य संत बाबा रामदेव जी की उपस्थिति में होगा।

  3. apun bolega says:

    आज कल जहाँ देखो संघ के खिलाफ खूब जहर उगला जा रहा है । नई पीढी के समक्ष संघ को फासीवादी और नाजीवादी सोच का बताया जा रहा है । हो सकता है कि यहाँ मुझे भी कुछ लोग इसी सोच का बताएं ! मुझे इस बात का डर नही ,मैं आजतक संघ की शाखाओ में नही गया फ़िर भी संघ के सेवा और सांस्कृतिक कार्यों को पसंद करता हूँ । वैसे यहाँ कुछ भी मैंने अपनी ओर से कुछ नही कहा है । " हिंदुस्तान के दर्द " को बाँटने के भागीदार कुछ चिंतकों की पोस्ट पढ़-पढ़ कर ऐसा महसूस होता है उन्हें समाज को बाँटने में ज्यादा मज़ा आता है । एक विवादित ढांचे और गुजरात दंगों का आरोप संघ परिवार पर लगा कर उसको सांप्रदायिक होने का सर्टिफिकेट दे दिया जाता है । वही बुद्धिजीवी और मीडिया संघ के हजारों समाजसेवा के कार्य को नजरंदाज करती रही है । संघ के सम्बन्ध में सदी के सबसे बड़े धर्मनिरपेक्ष नेता और हमारे बापू "महात्मा गाँधी जी " जिनकी हत्या का आरोप भी संघ पर लगा था , ने १६- ०९- १९४७ में भंगी कोलोनी दिल्ली में कहा था -" कुछ वर्ष पूर्व ,जब संघ के संस्थापक जीवित थे , आपके शिविर में गया था आपके अनुशासन , अस्पृश्यता का अभाव और कठोर , सादगीपूर्ण जीवन देखकर काफी प्रभावित हुआ । सेवा और स्वार्थ त्याग के उच्च आदर्श से प्रेरित कोई भी संगठन दिन-प्रतिदिन अधिक शक्ति वान हुए बिना नही रहेगा । "

    बाबा साहब अम्बेडकर ने मई १९३९ में पुणे के संघ शिविर में कहा था – "अपने पास के स्वयं -सेवकों की जाति को जानने की उत्सुकता तक नही रखकर , परिपूर्ण समानता और भ्रातृत्व के साथ यहाँ व्यवहार करने वाले स्वयंसेवकों कोदेख कर मुझे आश्चर्य होता है । "

    संघ के सन्दर्भ में एक अन्य घटना की जानकारी मुझे मिली थी जब मैं भी बगैर सोचे-विचारे संघियों को कट्टरपंथी बोला करता था । उस घटना का जिक्र आप के समक्ष कर रहा हूँ – ' सन १९६२ में चीन ने हिन्दी-चीनी भाई के नारे को ठेंगा दिखाते हुए भारत पर हमला कर दिया । भारत को अब किसी युद्ध में जाने की जरुरत नही है सेना का कम तो बस परेड में भाग लेना भर है की नेहरूवादी सोच के कारण सेना लडाई के लिए तैयार नही थी । तब तुंरत ही स्वयंसेवक मैदान में कूद गए । सेना के जवानों के लिए जी जन से समर्थन जुटाया वहीँ भारतीय मजदूर संघ ( ये भी संघ का प्रकल्प है) ने कम्युनिस्ट यूनियनों के एक बड़े वार्ग्ग की रक्षा उत्पादन बंद करने की देशद्रोही साजिश को समाप्त किया । तब प्रथम प्रधानमंत्री पंडित नेहरू संघ के कार्य से इतने प्रभावित हुए की कांग्रेसी विरोध को दरकिनार करते हुए २६ जनवरी १९६३ की गणतंत्र दिवस परेड में सम्मिलित होने का निमंत्रण दिया ।"

    अन्य दो -तीन उल्लेखनीय सेवा कार्य जो मेरी स्मृति में है – *१९७९ के अगस्त माह में गुजरात के मच्छु बाँध टूटने से आई बाढ़ से मौरवी जलमग्न हो गया था । संघ के सेवा शिविर में ४००० मुसलमानों ने रोजे रखे थे । अटल जी जब वहां गए थे तो मुसलमानों ने कहा था -'अगर संघ नही होता तो हम जिन्दा नही बचते । '

    *१२ नवम्बर १९९६ चर्खादादरी , दो मुस्लिम देशों के यात्री विमानों का टकराना , ३१२ की मौत जिसमे अधिकांश मुस्लिम और भिवानी के स्वयंसेवकों का तुंरत घटना स्थल पर पहुंचना , मलवे से शव निकलना सारी सहायता उपलब्ध करना । इतना ही नही शवों के उचित रीति रिवाज से उनके धर्मानुसार अन्तिम संस्कार का इन्तेजाम करना । तब साउदी अरेबिया के एक समाचारपत्र 'अलरियद ' ने आर एस एस लिखा था- " हमारा भ्रम कि संघ मुस्लिम विरोधी है, दूर हो गया है । "

  4. महत्वपूर्ण आलेख!

    Carbon Nanotube As Ideal Solar Cell

  5. अब समझ आया कि संघ का प्रेम बार बार सोनिया जी पर क्यों उमड़ता है। इतालवी संबंध का पता न था।

    महत्वपूर्ण आलेख।

    आरती के उपरांत प्रसाद मिल जाए तो समझें पूजा सार्थक है।

  6. अच्छा खुलासा…

    दिनेश जी कितनी महत्वपूर्ण बात यूं ही कह गये हैं..
    ‘आरती के उपरांत प्रसाद मिल जाए तो समझें पूजा सार्थक है।’

  7. ali says:

    भाई संदीप ,
    मुझे अफ़सोस है की आलेख पर नज़र देर से पड़ी ! शायद इन्टरनेट पर , मेरी अनियमित उपस्थिति इसकी वजह है !
    अब क्या टिप्पणी लिखूं "नफरत आलूदा जेहनियत" पर !

  8. संदीप जी लेख अत्यंत सार्थक है। "अपुन बोलेगा" ने संघ की जो तरफ़दारी की है वो बह्त द्खदायी है। ख़ैर ये उनकी अपनी राय है। लेकिन वह शायद यह नहीं समझते कि संघ की विचारधारा कितनी हिन्दुवादी है। अगर संघ की विचारधारा पर चलना पडे तो शायद हर दिन एक मन्दिर गिराना पडेगा।

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फ़ासीवाद, धार्मिक कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता संबंधी स्रोत सामग्री

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