गर्म हवाः एक वक्त के उखड़ने और सूखने की दास्तां

August 14th, 2011  |  Published in फिल्‍म/Films

शाहनवाज़ आलम
अगर थोडी देर के लिये इस बात को नजरअंदाज कर दिया जाये कि 1973 में एमएस सथ्यू द्वारा निदेर्शित फिल्म गर्म हवा को अंतराष्ट्रीय एकेडमी अवार्ड के लिये या केंस फिल्म महोत्सव के प्रतिष्ठित गोल्डेन पाल्म अवार्ड के लिये नामित किया गया था, या भारत में उसे आधा दर्जन पुरस्कार मिले, तब इस राजनीतिक फिल्म के महत्व और उसके कॉन्टेंट को समझना ज्यादा आसान होगा। ऐसा इसलिये कि अवार्ड विनिंग फिल्में अक्सर टे्ंड सेटर बन जाती हैं। यानी बाद के दौर में उन फिल्मों की नकल करने या उनके विषय वस्तु को उठा कर फिल्में बनाने का पूरा सिलसिला शुरू हो जाता है।
लेकिन ‘गर्म हवा’ अपने आप में इस ट्रेंड के विपरीत एक ऐसी फिल्म है जिसकी न तो नकल करने की ही कोशिश की गयी और ना उसके विषय वस्तु को ही छूने की कोशिश की गयी। इस तरह यह फिल्म, हिंदी फिल्म उद्योग, जो किसी भी अवार्ड विनिंग फिल्म की नकल बनाने के लिये जाना जाता है, की इस नकलची प्रवित्ति पर भी सवाल उठाती है कि क्या नकल भी सिर्फ उन्हीं फिल्मों की होती है जिनकी राजनीतिक दिशा राज्य सत्ता की नीतियों से मेल खाती है या जो उन्हीं सामाजिक स्टीरियोटाईप्स को मजबूत बनाती हैं जिसे सत्ता निर्मित और पोषित करती है।
इस्मत चुगताई की एक अप्रकाशित कहानी पर कैफी आजमी और शमा जैदी द्वारा लिखित और बलराज साहनी, फारूक शेख और शौकत आजमी अभिनित ‘गर्म हवा’ बंटवारे के बाद के भारत में रह गये एक मुसलमान परिवार की बदली हुयी राजनीतिक परिस्थितियों में पारिवारिक और सामाजिक विचलन की कहानी है। जो व्यक्तिगत होते हुए भी पूरे मुस्लिम समाज की स्थिति को बयान करती है। जिसको फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही जब बलराज साहनी पाकिस्तान जाने वाले अपने एक और परिजन को ट्रेन पर चढा कर लौट रहे हैं से तांगे वाला (राजेंद्र रघुवंशी) कह कर स्थापित करता है कि ‘बडी गर्म हवा है मियां, जो उखडा नहीं सूख जावेगा मियां’।
फिल्म सलीम मिर्जा (बलराज साहनी) जो आगरा के एक प्रतिष्ठित जूता कारखाने के मालिक हैं के परिवार के इसी गर्म हवा से आंतरिक और बाहरी संघर्ष की कहानी है। जहां आंतरिक तौर पर उनके परिवार के सदस्य एक-एक कर उखड के पाकिस्तान चले जा रहे हैं। जबकि सलीम मिर्जा को लगता है कि ‘गांधी जी की शहादत रायगा नहीं जायेगी’ और कुछ दिनों बाद सब कुछ ठीक हो जायेगा। सलीम मिर्जा अपने इसी विश्वास के चलते अपने भरे पूरे परिवार से बिछड कर सिर्फ अपनी मां, पत्नी, बेटी और बेटे के साथ रह जाते हैं।
जबकि बाहरी समाज की वास्तविक दिशा उनके विश्वास के ठीक विपरीत है। और बंटवारे के दौरान दिखी मुस्लिम विरोधी शारीरिक हिंसा अब बहुत तेजी से संस्थागत रूप ले रही है।
जहां एक मुस्लिम नौजवान (फारूक शेख) को नौकरी के लिये इंटरव्यू के दौरान कहा जाता है ‘आप यहां अपना समय बर्बाद कर रहे हैं, आप पाकिस्तान क्यूं नहीं चले जाते’ या किराये का मकान ढूंढ़ने वाले एक मुसलमान (बलराज साहनी) को मकान मालिक से पहले कहना पडता है कि ‘मेरा नाम सलीम मिर्जा है और मैं एक मुसलमान हूं, क्या आप मुझे मकान देंगे।’ सलीम मिर्जा परिवार के लिये स्थितियां उस समय और भयावह हो जाती हैं जब उन पर एक नक्शा पाकिस्तान भेजने और पाकिस्तान के लिये जासूसी करने का झूठा मुकदमा लाद दिया जाता है।

गौरतलब है कि बंटवारे के बाद भारत में रह गये मुसलमानों को साम्प्रदायिक होते राज्य व्यवस्था द्वारा प्रताणित करने का यह सबसे आसान हथियार रहा है। जिसके चलते न जाने आज भी कितने निदोर्ष मुसलमान पाकिस्तान के लिये जासूसी करने के झूठे मामलों में जेलों में सडने के लिये मजबूर हैं। सम्भवतः भारतीय राज्य व्यवस्था द्वारा मुसलमानों के रूप में एक स्थाई आंतरिक शत्रु के निर्माण की इसी षडयंत्रकारी राजनीतिक परिघटना को चित्रित करने के चलते ही देश-विदेश में पुरस्कार हासिल करने वाली यह फिल्म कभी नकलची बालीवुड को अपनी विषय वस्तु ‘चुराने’ के लिये प्रेरित नहीं कर पायी।

बहरहाल, मिर्जा परिवार के आंतरिक और बाहरी जद्दोजेहद के साथ ही फिल्म एक महिला के नजरिये से भी इन परिस्थितियों का जायजा लेती है। आमना (गीता सिद्धार्थ), जो सलीम मिर्जा की बेटी है की शादी पाकिस्तान जा चुके उसके चचेरे भाई काजिम मिर्जा (जमाल हाशमी) से तय है। पाकिस्तान से पढाई के लिये लंबे समय तक विदेश जाने से पहले काजिम आमना से शादी करने के लिये गैर कानूनी तरीके से भारत आ जाता है। लेकिन शादी से चंद रोज पहले ही पुलिस उसे पकड कर वापस पाकिस्तान भेज देती है। जिससे आमना पूरी तरह टूट जाती है। कुछ समय बाद स्थितियों से समझौता करके आमना अपनी जिंदगी में एक दूसरे लडके को आने देती है। लेकिन एक अमीर लडकी से शादी तय हो जाने के बाद वह उसे छोड़ देता है। पूरी तरह टूट चुकी आमना इस ‘गर्म हवा’ को बर्दाश्त नहीं कर पाती और आत्म हत्या कर लेती है।
फिल्म सलीम मिर्जा परिवार के साथ की उस दौर के आम सामाजिक हालात को भी चित्रित करने में सफल रही है। जिसे बेरोजगार युवकों के बहसों में बखूबी देखा जा सकता है। जहां किसी को सिर्फ इसलिये नौकरी नहीं मिल पाती कि उससे रिश्वत मांगा जाता है तो किसी को अंग्रेजी अच्छी नहीं होने के चलते बेकार बैठना पडता है। वहीं इन बेरोजगारों को मुफ्त में चाय पिलाने वाला दुकानदार उन आदर्शों का प्रतिनिधि है जिसकी बुनियाद पर आजादी की लडाई लडी गयी थी। दुकानदार, जो स्वतंत्रता सेनानी है का आजादी के बाद के हालात पर टिप्पणी है ‘मैं सत्याग्रह में शामिल हुआ, जेल गया, लाठियां खायीं लेकिन आजादी मिली तो मलाई कुत्ते खा रहे हैं।’
बहरहाल, भारतीय मुसलमानों की समस्या पर बनी अब तक की सबसे महत्वपूर्ण फिल्म समस्या का हल भी सुझाती है। और हल भी मुस्लिम केंद्रित नहीं बल्कि सेक्यूलर और प्रगतिशील। जिसके केंद्र में सलीम मिर्जा जैसे उम्र दराज लोग नहीं बल्कि चायखाने पर बैठने वाले बेरोजगार युवा हैं। जो बेरोजगारी, भूख और साम्प्रदायिक भेदभाव पर आधारित होती जा रही राजनीतिक व्यवस्था को जनवादी रास्ते पर ले आना चाहते हैं। जिनका नारा ‘इन्कलाब जिंदाबाद और रोजी-रोटी लाल निशान, मांग रहा है हिंदुस्तान’ है।
अपनी मां और बेटी की मौत से टूट चुके सलीम मिर्जा, जो कभी पाकिस्तान जाने के सुझाव पर कहते थे कि ‘यह उम्र दुनिया छोड कर जाने की है वतन नहीं’, भी जब पाकिस्तान जाने के लिये तांगे से निकलते हैं तब यही नारा उनमें उम्मीद जगाता है। और फिल्म के आखिरी दृष्य में वे और उनका बेटा नारे लगाती उस भीड में शामिल हो कर अपनी ही जैसी तकलीफों की शिकार लोगों के जन सैलाब में खो जाते हैं।
2005 में इंण्यिा टाईम्स मूवीज द्वारा बालीवुड की सर्वकालिक बेहतरीन 25 फिल्मों में शुमार ‘गर्म हवा’ के निर्माण से जुडी कहानी भी काफी दिलचस्प है। साम्प्रदायिकता जैसे राजनीतिक मुद्दे पर प्रगतिशील नजरिये से बनने के चलते फिल्म की शूटिंग के दौरान लोकेशन (आगरा) पर कई बार हिंदुत्वादी अराजक तत्वों ने अवरोध उतपन्न करने की कोशिश की। जिससे निपटने के लिये एमएस सथ्यू ने कई डमी यूनिट बनाईं जो अनलोडेड कैमरे के साथ वास्तविक लोकेशन से काफी दूर जा कर शूटिंग का नाटक करते थे। जिससे विरोध करने वालों का ध्यान बंट जाये और फिल्म की वास्तविक शूटिंग चलती रहे।
(मीडिया चार्टशीट से साभार)


 


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