मुम्‍बई की ‘स्पिरिट’ और भारत की आत्‍मा

July 31st, 2011  |  Published in फ़ासिस्‍ट कुत्‍सा प्रचार का भंडाफोड़/Exposure, साम्‍प्रदायिकता

मुंबई में हाल ही में हुए बम धमाकों के बाद सुब्रमणियम स्‍वामी ने डीएनए में सांप्रदायिक नजरिए से और घृणा फैलाने वाला एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था ‘इस्‍लामी आतंकवाद का खात्‍मा कैसे किया जाए – एक विश्‍लेषण’. इस लेख पर प्रबुद्ध नागरिकों ने त्‍वरित एवं तीखी प्रतिक्रिया की। फिल्‍मकार राकेश शर्मा ने डीएनए में ही स्‍वामी के इस लेख का जवाब लिखा। हम अंग्रेजी में प्रकाशित इस लेख का हिंदी अनुवाद ‘बर्बरता के विरुद्ध’ के पाठकों के लिए प्रस्‍तुत कर रहे हैं।
हिंदुत्‍ववादी कट्टरपंथी ताक़ते अब स्‍वामी के समर्थन में उतर आई हैं और उनके के इस लेख को सही बताते हुए टिप्‍पणियां, पत्र, ईमेल आदि लिखने का अभियान  चला रखा है। सभी प्रगतिशील नागरिकों से अनुरोध है कि वे भी इस अभियान का जवाब दें और इस लेख के अंत में दिए गए लिंक, ईमेल पतों पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराएं।
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(17जुलाई 2011, रविवार को डी एन ए में प्रकाशित)
मुम्‍बई की ‘स्पिरिट’ और भारत की आत्‍मा
**राकेश शर्मा* *
-सुब्रमणियम स्‍वामी के घृणा फैलाने वाले लेख (डी एन ए, 16 जुलाई) का प्रत्‍युत्‍तर 

मैं जिस मुंबई शहर को दो दशकों से भी अधिक समय से अपना घर कहता हूँ,वहाँ इस सप्‍ताह हुए बम धमाकों के बाद मैंने भयाकुल होकर कई टीवी चैनल देखे,कई कर्कश सोशलाइटों, मौकापरस्‍त राजनेताओं औरसर्वज्ञाता टीवी एंकरों को पादरीनुमा ज्ञान बघारते सुना। हम सभी पर ऑनलाइन उन्‍माद, टीवी चैनलों के उपदेशों और 140 अक्षरों में हर जटिल समस्‍या का चटपटसमाधान बताने वाली भद्दी ‘ट्वीट्स’ की मानो बौछार हो गर्इ है। जांच-पड़ताल का कोई निष्‍कर्ष निकलने से पहले ही अज्ञानी और विशेषज्ञ दोनों तरह के लोगों ने तरह-तरहके आक्रामक सुझाव दे डाले – पड़ोसी कोनेस्‍तनाबूद कर दो, बातचीत बंद करो,आतंकी ठिकानों को नष्‍ट करने के लिए हमला करो, बड़े पैमानेपर गिरफ्तारी के आदेश दो, हरेक नागरिकों पर निगरानी बढ़ाओ(ख़ासकर एक समुदाय विशेष के नागरिकों पर), पोटा को वापस लाओ, मुकदमों की त्‍वरित सुनवाई और फैसला करो, कसाब कोफांसी दो, अफ़ज़ल को फांसी दो आदि-आदि। 

प्रसिद्धिके भूखे नेता अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए नीतिगत विफलताओं, रीढ़विहीनसरकारों की कठोर विवेचनाओं और इस्‍तीफ़ों की माँग की रट लगाए हुए हैं। सुब्रमणियमस्‍वामी जैसे लोग हमें प्रेरित करते हैं कि हम आतंक की महाविपत्ति का जवाब हिन्‍दुओंकी तरह दें न कि भारतीयों की तरह, वो हमें आगाह करते हैं कि तालिबान हमारी चौखट तकआ गया है, वो अपने पुराने सिद्धांतों पर जमी धूल को साफ़ करके और पुन: चक्रित करकेहमें पेश करते हैं तथा हमें वस्‍तुत: हिन्‍दू तालिबान में रूपान्‍तरित होने की सलाहदेते हैं।     
इनमेंसे हरेक ऐसा भुक्‍तभोगियों के नाम पर करता है! अपनी राय, सिद्धांत और उपचारपेश करते वक्‍़त इनमें से हरेक शोकाकुल परिवारों के लिए आँसू बहाता है। पिछले 10वर्षों में नफ़रत की राजनीति और उसके फ़ौरी और दीर्घकालिक भीषण दुष्‍परिणामों परकेन्द्रित फिल्‍मों के निर्माता के तौर पर मैने ऐसे बहुतेरे लोगों को चित्रित कियाहै जिनकी आतंक और संगठित हिंसा के कृत्‍यों द्वारा दुनिया ही उजाड़ दी गयी है। S-6 मेंमारे गये लोगों के परिवारों की धुँधली तस्‍वीरें जिन पर बाद में ‘कारसेवक’ का ठप्‍पालगा दिया गया और जिनकी त्रासदियों को बेशर्मी से वोटों के लिए भुनाया गया एवं 2002के गुजरात नरसंहार में मुस्लिम परिवारों पर सबसे घृणित स्‍तर की बर्बरता और ज़ुल्‍मऐसी अनगिनत कहानियों में से हैं जिनके दस्‍तावेज़ मैंने बनाये हैं। मैंने 26/11 केआतंकी हमले के बाद के घटनाक्रम और उसके पहले 2006 में मुम्‍बई के सिलसिलेवार बमधमाकों को भी चित्रित किया है। मैंने ऐसे एक दर्जन मुस्लिम परिवारों से बातचीत कीहै जिनको कसाब द्वारा सी एस टी/ वी टी स्‍टेशन पर मारा गया था और बीसियों हिन्‍दू भुक्‍तभोगियोंका अस्‍पताल और उनके घरों में इण्‍टरव्‍यू लिया है। इण्डियन मुजाहिद्दीन केबमों से प्रभावित लोगों के साथ ही साथ मालेगांव में अभिनव भारत के बमों कादु‍ष्‍परिणाम भोगते लोगों की व्‍यथा भी मैंने अपने कैमरे में कैद की है। 
ऐसेसभी लोगों से जो इस समय ज़हर उगल रहे हैं और भुक्‍तभोगियों के नाम पर असहिष्‍णुताफैला रहे हैं, मैं यह कहना चाहता हूँ कि प्रभावित हिन्‍दू एवं मुस्लिम परिवारों केबीच हफ़्तों और महीनों बिताने के दौरान मुझे ऐसा एक भी व्‍यक्ति नहीं मिला जोअसहिष्‍णुता का पालन करता हो या फैलाता हो या दूसरी कौम के खिलाफ़ नफ़रत की भावनारखता हो। उनमें से सभी नफ़रत की भर्त्‍सना करते हैं, उनमें से एक भी ऐसा नहीं हैजो प्रत्‍यक्ष तौर पर या फिर उनके नाम पर बदले की ख्‍़वाहिश रखता हो। लेकिन उनमेंसे कोई भी इसको नहीं भूला है या फिर अपनी क्षति को दार्शनिक तौर पर स्‍वीकार करपाया है। निरपवाद रूप से अधिकांश में मैंने न्‍याय की एक प्रबल इच्‍छा देखी किदोषी को कड़ी से कड़ी सजा मिले तथा एक उत्‍कट कामना देखी कि किसी को भी ऐसीदुर्गति न झेलनी पड़े चाहे वह उनकी कौम का हो या फिर किसी भी कौम का हो। इंसाफ़शब्‍द मुझे हमेशा ही सुनाई दिया लेकिन नफ़रत कभी नहीं! कइयोंमें मैने आक्रोश देखा लेकिन निरपवाद रूप से उन लोगों के खिलाफ़ जो उनकी त्रासदियोंको भुनाते हैं, चाहे वह उनकी अपनी कौम के भ्रष्‍ट सदस्‍य हों जो राहत सामग्री मेंहेर फेर करते हैं या फिर ह्रदयहीन नौकरशाही और असंवेदनशील मीडिया रिपोर्टरों केखिलाफ़, लेकिन ज्‍़यादातर मामलों में नेताओं के खिलाफ़ जो उनकी त्रासदियों कोकुटिलता से भुनाने की कोशिश करते हैं। ‘हमारी लाश पर वोट की रोटी सेंकते हैं येलोग’ – मैंने हिन्‍दू और मुस्लिम दोनों ही भुक्‍तभोगियों को ऐसा कहते बार-बारसुना है।     
मैंने उनके धैर्य, साहस, संवेदनशीलता और इंसानियत की भूरि-भूरि प्रशंसा कीहै। उनको सहिष्‍णुता का पाठ पढ़ाने की बजाय उल्‍टा मैंने उनसे सीखा है। मैंने इसेउनकी आँखों में देखा है, उनकी वाणी में सुना है, उनकी आवाज़ में महसूस किया है औरउनकी कार्रवाहियों में परिलक्षित होते देखा है। इसलिए मुझे यकीन है कि भले हीमुट्ठी भर कुछ ऐसे लोग हों जो नफ़रत और असहिष्‍णुता में विश्‍वास करते हों, लेकिनआम जनता और ‘भुक्‍तभोगी’ इसमें विश्‍वास नहीं करते और हमारे देश का सामाजिकताना-बाना और उसमें अन्‍तर्निहित सामाजिक लोकाचार तथा सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्‍वके मूल्‍य इतने मज़बूत हैं कि उनको नष्‍ट नहीं किया जा सकता है। इसलिए मैं अभी भीयह विश्‍वास करता हूँ कि नफ़रत की राजनीति कभी भी भारत में प्रतिनिधि और निर्णायकताकत नहीं बन सकती।
आजका दौर एक भयानक दौर है। एक नागरिक के तौर पर हम सभी एक गहरा आक्रोश, निराशा औरलाचारी महसूस करते हैं। ऐसे में धीरज खोना, संदर्भ से कट जाना और अप्रासंगिकजुमलेबाजियों की चपेट में आना आसान है। लेकिन यह आक्रामकता को बढ़ावा देने,राजनीतिक बहसबाजी और हालिया और मध्‍यकालीन इतिहास को फिर से लिखने या विश्‍लेषणकरने का समय नहीं है। यह हम सभी के एकजुट होने और उन सभी के खिलाफ़ एक ही सुर मेंआवाज़ उठाने का वक्‍़त है जो आतंक को अंज़ाम देते हैं। 
आतंक फैलाने का मक़सद है हमें बाँटना, हमारे जोशो-खरोश को ठंडा करना, तर्कणा को नष्‍ट करना,सामाजिक ताने-बाने को छिन्‍न-भिन्‍न करना और हमारी समृद्ध विविधता जो हमेंसबसे प्राचीन सभ्‍यता और आवेगमय लोकतंत्र बनाती है, उसको तहस-न‍हस करना। यदि हमनफ़रत, धर्मान्‍धता और असहिष्‍णुता के सामने घुटने टेक देंगे या यदि हम अपनीनागरिक आज़ादी पर अंकुश लगायेंगे, अपनी किन्‍हीं भी संवैधानिक स्‍वतंत्रताओं औरअधिका‍रों को निलंबित करेंगे या किसी संप्रदाय विशेष को विलेन बनाकर उनपर निशानासाधेंगे तो आतंकवादी अपने मक़सद में क़ामयाब हो जायेंगे।  
किसीभी प्रकार का ऑनलाइन उन्‍माद, टीवी उपदेश, इस्‍तीफ़े की माँग या कोई भी बेमतलब कीहरकत कोई वास्‍तविक बदलाव नहीं ला सकती यदि हम नफ़रत को पलने और फलने फूलने कामौका देते रहेंगे। जब तक नफ़रत मौजूद है, जब तक हम नफ़रत फैलाने वालों को बर्दाश्‍तकरते रहेंगे, जब तक हम असहिष्‍णुता की राजनीति का बहिष्‍कार नहीं करते, तब तक शायदशान्ति के बारे में सोचना बेमानी है। नफ़रत की राजनीति केवल और भी ज्‍़यादा नफ़रतही पैदा कर सकती है;कोईबावला ही ऐसा विश्‍वास कर सकता है कि नफ़रत का गहराता चक्र शान्ति और समृद्धता कीओर ले जायेगा और एक शक्तिशली लोकतंत्र एवं सौहार्दपूर्ण समाज को मज़बूत बनायेगा।कृ्पया नफ़रत को न बढ़ावा दें।      
आइयेहम नफ़रत फैलाने वालों की निन्‍दा करें चाहे वो किसी भी संप्रदाय, जाति अथवा पंथके हों। आइये हम यह माँग करें कि सभी धमाकों और हमलों के दोषियों को सजा मिले।लेकिन सबसे पहले आइये हम आत्‍मचिंतन करें, अपने अंदर झाँक कर देंखें और अपनेपूर्वाग्रहों, असहिष्‍णुता और पक्षपातों को दूर करें। जब हम एक व्‍यक्ति, एक कौम,समाज और राष्‍ट्र के रूप में नफ़रत से छुटकारा पा लेंगे तभी हम शान्ति की कल्‍पनाकर सकते हैं। नफ़रत के इस दुष्‍चक्र से निपटने की दिशा में यह पहला कदम होगा। आइयेहम उनसे सीखें जो भुक्‍तभोगी हैं लेकिन फिर भी नफ़रत नहीं पालते और उन सभी कोखारिज़ करते हैं जो उनके नाम पर नफ़रत को फैलाते हैं और उसको बढ़ावा देते हैं!यही सच्‍ची श्रद्धांजलि होगी।
(मेरे अनुसार यही मुम्‍बई की सच्‍ची ‘रिज़ीलिएण्‍ट स्पिरिट’ और भारत की आत्‍मा का सारतत्‍व है) 
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 डॉ. सुब्रमणियम स्‍वामी और डीएनए के संपादक के नाम ईमेल भेज कर स्‍वामी के लेख की निंदा करें और नीचे दिए गए लिंक्स पर अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करें:
सुब्रमणियम स्‍वामी : swamy39@gmail.com
अजय सिन्‍हा, संपादक, डीएनए : asinha@dnaindia.net
http://blogs.wsj.com/indiarealtime/2011/07/27/swamy-op-ed-stokes-furor-at-harvard/
http://www.thecrimson.com/article/2011/7/27/swamy-harvard-india-petition/

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यहां जिन वेबसाइट्स या ब्‍लॉग्‍स के लिंक दिए गए हैं, उन पर प्रकाशित विचारों-सामग्री से हमारी पूरी सहमति नहीं है। लेकिन एक ही स्‍थान पर स्रोत-सामग्री जुटाने के इरादे से यहां ये लिंक दिए जा रहे हैं।
 

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