आनंद पटवर्धन की फिल्म “राम के नाम”

November 28th, 2011  |  Published in फिल्‍म/Films, बाबरी मस्जिद/Babari Majid

आनंद पटवर्धन की “राम के नाम” फिल्म बखूबी बयां करती है कि साम्‍प्रदायिकता किस तरह भारत में सत्ता हासिल करने का माध्यम है। आनन्‍द ने यह फिल्‍म मस्जिद के ढहाए जाने से पहले 1991 में ही पूरी कर ली। 16वीं शताब्दी में बनी हुई बाबरी मस्जिद को बताया जाता है कि यह राम मंदिर को तोड़कर बनाई गई है, इसलिए अब बाबरी मस्जिद को तोड़कर ही राम का मंदिर बनना चाहिए। फिल्म राम के नाम को हर तरफ से जाचंती है फिर विश्व हिंदू परिषद के राम को भी दिखाती है। आनंद उस साम्‍प्रदायिकता के सच को उजागर करते हैं, जो सत्ता हासिल करने के लिए राम के नाम का प्रयोग करती हुई लाशों का ढेर लगाती है। फिल्म धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ मानवता को सामने रखती है। बाबरी मस्जिद ढहाने के बाद हुए साम्‍प्रदायिक दंगों में हज़ारों लोगों धर्म की बलिबेदी पर चढ़ा दिया गया था। फिल्म में एक तरफ आम आदमी से लेकर विहिप, बजरंग दल, भाजपा सहित सभी नेताओं और पुजारियों के वक्तव्य हैं,  दूसरी तरफ मुस्लिम धर्म के लोगों की भी प्रतिक्रिया ली गई है। यह डेढ़ घंटे की फिल्म किसी भी संवेदनशील व्‍यक्ति को बेचैन कर देती है, सोचने को मजबूर करती है और फासिस्‍टों का असली चेहरा उजागर करते हुए उनके प्रति नफरत का भाव पैदा करती है।

 

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