भगवा आतंकवाद और भागवत का बचकानापन

March 13th, 2012  |  Published in हिंदुत्‍ववादी आतंकवाद/Hindutva Terrorism

-राम पुनियानी

गत 28 फरवरी को उच्चतम न्यायालय ने आरएसएस के सरसंघचालक डा. मोहन भागवत को यह दावा करने के लिए जमकर लताड़ लगाई कि हेमंत करकरे ने उन्हें बताया था कि उनपर (करकरे) समझौता एक्सप्रेस, अजमेर, मालेगांव आदि बम विस्फोटों से संबंधित मामलों में आरएसएस के कार्यकर्ताओं को फंसाने का जबरदस्त दबाव है। संघ के मुखिया के अनुसार, उनके करकरे से सौहार्दपूर्ण संबंध थे और करकरे ने इन मामलों को सुलझाने में उनसे सहयोग चाहा था। इसी सिलसिले में हुई बातचीत के दौरान करकरे ने उन्हें बताया था कि संघ को इन आतंकी हमलों में फंसाने के लिए उन पर दबाव डाला जा रहा है।

यह हम सब जानते हैं कि उस दौर में करकरे भारी दबाव में काम कर रहे थे। आतंकी हमलों की जांच का कोई नतीजा सामने नहीं आ रहा था। हर विस्फोट के बाद युवा मुसलमानों को पकड़कर जेल में ठूंस दिया जाता था और घटना के लिए लश्कर या अल्कायदा से जुड़े किसी भी संगठन को जिम्मेदार बता दिया जाता था। करकरे ने महाराष्ट्र पुलिस के आतंकवाद-निरोधक दस्ते के प्रमुख का कार्यभार संभालने के बाद आतंकी हमलों की सूक्ष्म व पूर्वाग्रह मुक्त जांच करनी शुरू की और इसके अच्छे नतीजे सामने आए। करकरे के नेतृत्व में आतंकवाद निरोधक दस्ते ने वह मोटरसाईकिल ढूंढ़ निकाली जिसका इस्तेमाल मालेगांव में बम विस्फोट करने के लिए किया गया था। इस मोटरसाईकिल की मालिक थीं प्रज्ञा सिंह ठाकुर, जो पूर्व में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ी रही थीं। इसके बाद जांच प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ी और जल्द ही उस पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो गया जिसे बाद में केन्द्रीय गृह मंत्री पी. चिदम्बरम ने “भगवा आतंकवाद“ का स्त्रोत बताया।

जांच और पूछताछ के रास्ते पुलिस, स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, स्वामी असीमानंद, इन्द्रेश कुमार, सुनील जोशी, कालसांगरा आदि तक पहुंची। ये सभी या तो आरएसएस या उसके किसी न किसी अनुषांगिक संगठन से जुड़े हुए थे। इस तथ्य का निहितार्थ स्पष्ट था।

इस हिन्दुत्व नेटवर्क का पर्दाफाश होने के बाद मस्जिदों व अन्य उन स्थानों पर जहां मुसलमान बड़ी संख्या में इकट्ठा होते हैं, में लगातार हो रहे आतंकी हमले अचानक बंद हो गए। क्या यह तथ्य महत्वपूर्ण नहीं है? यह सचमुच विडंबनापूर्ण था कि जिन हमलों में केवल या अधिकांशतः मुसलमान मारे जाते थे उनके लिए मुसलमानों को ही दोषी बताया जा रहा था। राजस्थान पुलिस की एटीएस ने इस जांच प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और हिन्दुत्ववादियों के आतंकी हमलों में शामिल होने के नए-नए सुबूत मिलते चले गए।

न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष स्वामी असीमानंद द्वारा दिए गए इकबालिया बयान से इन संगठनों के काम करने का तरीका सामने आया। इन हमलों में शामिल लोगों का यह विश्वास था कि वे मुस्लिम आतंकी हमलों का बदला ले रहे हैं और हिन्दू राष्ट्र के निर्माण का पथ प्रशस्त कर रहे हैं। गुजरात में आयोजित शबरी कुंभ के प्रमुख आयोजनकर्ता व विहिप कार्यकर्ता स्वामी असीमानंद इस नेटवर्क के प्रमुख थे। स्वामी ने मजिस्ट्रेट के समक्ष यह कुबूल किया कि वे व उनका संगठन आतंकी हमलों में शामिल थे।

शनैः-शनैः संघ परिवार की अन्य कुत्सित हमलों में भागीदारी सामने आने लगी। यह पता चला कि समझौता धमाके के पीछे कमल चैहान का हाथ था। कमल चैहान को उसके पितृ संगठन आरएसएस ने अपना “असंतुष्ट सदस्य“ बताया। यह आरएसएस की पुरानी चाल है। हत्याओं व अन्य आपराधिक कृत्यों में लिप्त पाए गए उसके सदस्यों के बारे में संघ हमेशा से या तो यह कहता रहा है कि वे पूर्व में ही संघ की सदस्यता त्याग चुके हैं या उनके स्वयंसेवक होने के तथ्य को ही सिरे से नकारता रहा है।

एक समय था जब कोई यह सपने में भी नहीं सोच सकता था कि संघ व उससे जुड़े संगठन आतंकी हमलों में शामिल हो सकते हैं। संघ का दावा था कि वह हिंसा में विश्वास नहीं रखता। उसके खोखले दावों का सच अब सबके सामने उजागर हो चुका है। इसलिए अब संघ की तरफ से यह दावा किया जा रहा है कि अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण के लिए शासक दल द्वारा उसे जबरन आतंकी हमलों से जोड़ा जा रहा है। यह भी कहा जा रहा है कि जिन लोगों को इन हमलों का सूत्रधार बताया जा रहा है वे पाक-साफ व्यक्ति हैं। एक ओर आरएसएस आतंकी हमलों में लिप्त पाए गए व्यक्तियों से स्वयं के संबधों को नकार रहा है तो दूसरी ओर वह यह प्रचार भी कर रहा है कि उन पर लगे आरोप सिद्ध होने तक वे निर्दोष हैं। साथ ही, यह भी कहा जा रहा है कि जांच अधिकारियों पर संघ के सदस्यों को फंसाने का दबाव है।

आरएसएस का अपने बचाव का यह तरीका अत्यंत बचकाना व हास्यास्पद है। संघ प्रमुख ने करकरे के संबंध में बयान, देश की रक्षा करते हुए इस बहादुर अधिकारी के शहीद हो जाने के लंबे समय बाद दिया। करकरे अब इस दुनिया में नहीं हैं और भागवत के दावे की पुष्टि या खंडन किया जाना आसान नहीं है। तथापि सच के नजदीक पहुंचने के कुछ रास्ते अभी भी उपलब्ध हैं।

यह स्मरणीय है कि मालेगांव हमले के सिलसिले में प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद लालकृष्ण आडवानी स्वयं प्रधानमंत्री से मिले थे और यह शिकायत की थी कि साध्वी को शारीरिक यंत्रणा दी जा रही है। उन्होंने इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग भी की थी। लगभग उसी समय एक अन्य हिन्दुत्ववादी बाल ठाकरे ने करकरे की असंसदीय शब्दों में निंदा की थी। शिवसेना के मुखपत्र “सामना“ में लिखते हुए ठाकरे ने कहा था कि करकरे राष्ट्रद्रोही हैं और “हम उनके मुंह पर थूकते हैं।“ हिन्दुत्व सेना के एक अन्य सिपहसालार नरेन्द्र मोदी ने भी करकरे को देशद्रोही बताया था। ज्ञातव्य है कि ठाकरे और मोदी, “हिन्दू ह्दय सम्राट“ कहे जाते हैं। करकरे की मौत के बाद मोदी ने पलटी खाई और वे उन्हें महान देशभक्त बताने लगे। यहां तक कि उन्होंने गुजरात सरकार की ओर से करकरे की पत्नि को एक करोड़ रूपये की सहायता देने का प्रस्ताव भी रखा जिसे करकरे की पत्नि ने गरिमापूर्वक ठुकरा दिया।

इसी संदर्भ में यह भी महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने यह दावा किया था कि 26/11 की रात करकरे ने उन्हें फोन पर बताया था कि उनपर दक्षिणपंथियों का जबरदस्त दबाव है। दिग्विजय सिंह ने इस सिलसिले में कुछ अखबारों की कतरनें भी दिखाई थीं और यह भी कहा था कि बीएसएनएल का भोपाल कार्यालय उनकी करकरे से बातचीत का रिकार्ड इसलिए उपलब्ध नहीं करा पा रहा है क्योंकि एक साल  से अधिक पुराने रिकार्डों को नष्ट कर दिया जाता है और करकरे से उनकी बातचीत इस अवधि के पहले हुई थी।

एक अन्य स्त्रोत से भी हमें यह पता चलता है कि करकरे पर दबाव कौन डाल रहा था। जूलियो रिबेरो देश के सबसे सम्मानित पुलिस अधिकारियों में से एक हैं। उनकी ईमानदारी व निष्पक्षता संदेह से परे है। करकरे को श्रद्धांजलि देते हुए अपने लेख (द टाईम्स ऑफ इंडिया, मुंबई 28 नवम्बर 2010) में उन्होंने लिखा कि करकरे, आडवानी और हिन्दुत्व गैंग के अन्य सदस्यों की धमकियों से काफी परेशान थे। वे रिबेरो से मिले थे और उन्होंने अपनी व्यथा से उन्हें अवगत कराया था। रिबेरो ने पुष्टि की कि करकरे को आडवानी-मोदी व उनके संगी-साथियों द्वारा परेशान किया जा रहा था और डराया-धमकाया भी जा रहा था। रिबेरो ने करकरे को यह सलाह दी थी कि वे दबाव की परवाह किए बिना अपना काम निष्पक्षता से करते रहें। “वे मेरे पास इसलिए आए थे क्योंकि वे ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे जो उनका हाथ थाम सके“, रिबेरो ने मुंबई से टेलीफोन पर समाचार एजेंसी आईएएनएस को कहा था। उन्होंने यह भी कहा था कि करकरे, राजनैतिक दबाव के आगे झुकने वालों में से नहीं थे।

सच सबके सामने है। भागवत के इस बयान के असली लक्ष्य को भी हम समझ सकते हैं। संघ परिवार के अनेक सदस्यों के जेलों में होने और कईयों के फरार रहने के कारण भागवत का परेशान होना स्वाभाविक है। भागवत के पूर्ववर्ती के. सुदर्शन ने भी ऐसा ही खेल खेला था। जब बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने की जांच में यह सामने आने लगा कि आरएसएस की इस घटना में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी तब सुदर्शन ने यह दावा किया था कि उन्होंने गांधीवादी नेता निर्मला देशपांडे को यह कहते हुए सुना था कि मस्जिद के अंदर एक बम विस्फोट हुआ जिसके कारण मस्जिद ढह गई। सौभाग्यवश, निर्मला दीदी उस समय जीवित थी और उन्होंने साफ शब्दों में सुदर्शन के दावे का खंडन किया था।

आरएसएस मुखिया का पद पिता से पुत्र को नहीं जाता। परंतु ऐसा लगता है कि फिर भी उनमें एक सी जीन्स होती हैं!

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

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