साम्‍प्रदायिकता

हाशिमपुरा नरसंहार: कब कटेंगे अन्याय के लम्बे बरस?

May 26th, 2011 by Smash Fascism | 5 Comments

महताब आलम “जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होतें हैं जो जिन्दगी भर आपका पीछा नहीं छोडतें.एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलतें हैं और कई बार तो कर्ज की तरह आपके सर पर सवार रहतें हैं. हाशिमपुरा भी मेरे लिये कुछ ऐसा ही अनुभव है.22-23मई सन 1987की आधी रात दिल्ली गाजियाबाद सीमा पर […]


भगवा जनसांख्यिकी के बारे में

December 6th, 2010 by Smash Fascism | No Comments

मोहन राव (ईपीडब्‍ल्‍यू, वॉल्‍यमू XLV नं. 41 अक्‍टूबर 09,2010 से साभार) हाल ही में मैंनेइंटरनेशनल जर्नल ऑफ़ हेल्थ सर्विसेज़ को एक आलेख भेजा जो इस बात की पड़ताल करता है की किस प्रकार नव-माल्थसवादी जनसांख्यिकी विमर्श और नव-उदारवादी नीतियाँ; अस्मिता और कट्टरपंथ के विमर्श में और निश्‍चय ही अल्पसंख्यकों पर प्राणघातक हमलों में – जैसा की २००२ में गुजरात में हुआ – योगदान करते हैं. अब यह लगता है की यह भोलेपन की ही निशानी थी की मुझे इस बात का एहसास नहीं हुआ की तथाकथित हिन्दू विमर्श कहॉं तक पहुँच गया है. मुझे हैरानी तब हुई जब […]


तुम भी हम जैसे ही निकले

May 31st, 2010 by Smash Fascism | 5 Comments

फासिस्‍ट ताकतें किसी भी धर्म या देश की हों, वे अल्‍पसंख्‍यकों  को निशाना बनाने का मौका तलाशती रहती हैं। वैसे सालों साल अल्‍पसंख्‍यकों के खिलाफ़ ज़हर उगलने का प्रचार अभियान तो जारी रहता ही है। यह हालत भारत में ही नहीं बल्कि पाकिस्‍तान में भी है, वहां के मुस्लिम कट्टरपंथी अल्‍पसंख्‍यकों की हत्‍याएं करना, तरह […]


ईश्वर की सत्ता में यकीन रखने वाले मित्रों से एक अपील!!!

May 16th, 2010 by Smash Fascism | 13 Comments

ईश्वर की सत्ता में यकीन रखने वाले मित्रों से एक अपील!!! आनंद सर्वशक्तिमान,सर्वज्ञानी, सर्वत्र परमपिता परमेश्वर जिनकी मर्ज़ी के बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता,उनकी सत्ता में यकीन रखने वाले मेरे धार्मिक मित्रों!मेरी तरफ़ से अपने परमपिता से कुछ सवाल करोगे क्या? मुझे तो अधर्मी, काफ़िर होने के संगीन जुर्म मेंबिना सुनवाई के, हिटलरशहाना अंदाज़ […]


संस्कृति के नाम पर

March 13th, 2010 by Smash Fascism | 13 Comments

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सोशल इंजीनियरिंग परियोजना के तहत बच्चों को मेघालय से कर्नाटक लाया जा रहा है और उन्हें उनकी मूल संस्कृति से काटकर हिंदुत्व की घुट्टी पिलाई जा रही है. ‘तहलका’ से संजना की रिपोर्ट: कर्नाटक के 35 स्कूलों और मेघालय के चार जिलों में की गई तीन महीने की गहन पड़ताल के […]


गौरव सोलंकी की कविता, ”मैं बिक गया हूँ”

February 22nd, 2010 by Smash Fascism | 5 Comments

एक वर्ष पहले अपने ब्‍लॉग शब्‍दों की दुनिया पर  गौरव सोलंकी की एक कविता पोस्‍ट की थी, कविता इस ब्‍लॉग के मिजाज के अनुकूल है, इसलिए दोबारा यहां पेश कर रहा हूं…कुछ लोगों ने इस कविता को गौरव की निराशा बताया तो, किसी ने इस पर कविता के मानदंडो पर खरा नहीं उतरने का आरोप […]


संस्कृति के रक्षकों कहो- किसकी रोटी में किसका लहू है?

February 16th, 2010 by Smash Fascism | 9 Comments

एक खासियत ये भी बताई जाती है कि हमारी संस्कृति बड़े-बुजुर्गों का आदर करना सिखाती है। यहां, गांव का एक दृश्य सवाल बनकर खड़ा हो जाता है। सत्तर बरस के बुजुर्ग बारह साल के एक बच्चे से कह रहे हैं बाबाजी गोड़ लागतानी…बच्चा कहता है खुस रह..। किसी बड़े आदमी के आंगन में सब चौकी या कुर्सी पर बैठे होते हैं और दलित बुजुर्ग नीचे ज़मीन पर उकड़ूं बैठता है। कहां गया बड़े-बुजुर्गों का आदर? सवाल जस का तस है..क्या है भारतीय संस्कृति?


परोपकार के नाम पर धार्मिक पाखंड थोपने की कवायद

December 17th, 2009 by Smash Fascism | 5 Comments

इसाई मिशनरी हों, या हिंदू और मुस्लिम कट्टरपंथी; ये राहत के नाम पर धर्म परिवर्तन, धर्म का पालन करने को बाध्‍य करने से लेकर तरह तरह की पुनरुत्‍थानादी, दकियानूसी हरकतें करते हैं। ताज़ा खबरें गुजरात में चल रहे मुस्लिम राहत शिविरों के बारे में आ रही हैं। इन शिविरों में सहायता प्रदान करने वाली मुस्लिम धर्मार्थ संस्‍थाएं अब शिविरवासियों को […]


तरुण विजय क्यों मान गये कि आरएसएस एक हिन्दू दक्षिणपन्थी संगठन है?

November 13th, 2009 by Smash Fascism | 7 Comments

अप्रैल में टाइम्‍स ऑफ इंडिया में तरुण विजय के एक लेख पर किसी ने किसी अंग्रेजी पत्रिका की साइट पर एक टिप्‍पणी की थी। उस अंग्रेजी की साइट का नाम तो नोट करना भूल गया था लेकिन उसका मैटर कॉपी कर लिया था। हमारे एक ब्‍लॉगर साथी अमर ने उस टिप्‍पणी का अंग्रेजी से हिंदी […]


आज के भारत में मुसलमान होने के मायने

October 9th, 2009 by Smash Fascism | 7 Comments

सांप्रदायिकता के ख़ि‍लाफ़ कई वर्षों से संघर्षरत ‘अनहद’ ने 3-5 अक्‍टूबर को एक तीन दिवसीय सम्‍मेलन आयोजित किया था। इस सम्‍मेलन का विषय था ‘आज के भारत में मुसलमान होने के मायने’। इस सम्‍मेलन में दंगा, एनकाउंटर पीड़ि‍तों ने अपनी आपबीती सुनाई, और कई एक्टिविस्‍टों ने अपने अनुभव साझा करने के साथ ही अपने सुझाव […]



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फ़ासीवाद, धार्मिक कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता संबंधी स्रोत सामग्री

यहां जिन वेबसाइट्स या ब्‍लॉग्‍स के लिंक दिए गए हैं, उन पर प्रकाशित विचारों-सामग्री से हमारी पूरी सहमति नहीं है। लेकिन एक ही स्‍थान पर स्रोत-सामग्री जुटाने के इरादे से यहां ये लिंक दिए जा रहे हैं।
 

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