फ़ासीवाद और आर्थिक नीतियां/Economic Policies and Fascism

टीवी जर्नलिज्‍म की दुनिया के गोयबल्‍स अर्नब गोस्‍वामी ने भगतसिंह के पोस्‍टरों को ISIS के पोस्‍टर बताकर चलायी खबर

May 30th, 2017 by Smash Fascism | 1 Comment

दिशा छात्र संगठन इस मामले में रिपब्लिक टीवी को कानूनी नोटिस तो भेज ही चुका है पर हमें ये भी समझना होगा कि फासीवादियों के तलवे चाटने वाले ये टीवी चैनल आगे आने वाले समय में इससे भी ज्‍यादा अफवाहों का सहारा लेंगे और प्रगतिशील, क्रांतिकारी व्‍यक्तियों व संगठनों के खिलाफ इस तरह की झूठी खबरें फैलाकर उन्‍हें बदनाम करने की साजिशें रचेंगे। इनका इतिहास ही झूठ का रहा है।


Cow(ard) politics — Something Bovine, Nothing Divine

April 22nd, 2015 by Smash Fascism | No Comments

By Sourav Banerjee:
It is the high time that the old rhetorics of cow(ard) politics should be challenged, based on the central question that did Hindus, especially the Vedic Indians, never consume beef?







स्याह दौर में कागज कारे

September 1st, 2014 by Smash Fascism | No Comments

* सुभाष गाताडे *
अगर हम अधिनायकवाद, फासीवाद के खिलाफ संघर्ष के पहले के अनुभवों पर गौर करें तो एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही हो सकती है कि हम एक संयुक्त मोर्चे के निर्माण की सम्भावना को टटोलें। सैद्धान्तिक तौर पर इस बात से सहमत होते हुए कि ऐसी तमाम ताकतें जो साम्प्रदायिक फासीवाद के खिलाफ खड़ी हैं, उन्हें आपस में एकजुटता बनानी चाहिए, इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि इस मामले में कोई भी जल्दबाजी नुकसानदेह होगी। उसे एक प्रक्रिया के तौर पर ही देखा जा सकता है – जिसके अन्तर्गत लोगों, संगठनों को अपने सामने खड़ी चुनौतियों/खतरों को लेकर अधिक स्पष्टता हासिल करनी होगी, हमारी तरफ से क्या गलति हुई है उसका आत्मपरीक्षण करने के लिए तैयार होना होगा और फिर साझी कार्रवाइयों/समन्वय की दिशा में बढ़ना होगा। कुछ ऐसे सवाल भी है जिन्हें लेकर स्पष्टता हासिल करना बेहद जरूरी है:







मोदी की जीत के कारण और संभावित नतीजे़

June 10th, 2014 by Smash Fascism | No Comments

लेकिन, फिलहाल, अहम बात यह है कि आने वाला समय मेहनतकश जनता और क्रांतिकारी शक्तियों के लिए कठिन और चुनौतीपूर्ण है। हमें राज्‍यसत्‍ता के दमन का ही नहीं, सड़कों पर फासीवादी गुण्‍डा गिरोहों का भी सामना करना पड़ेगा। रास्‍ता सिर्फ एक है। हमें तृणमूल स्‍तर पर मज़दूरों के बीच अपना आधार मजबूत बनाना होगा, यूनियन के अतिरिक्‍त उनके तरह-तरह के जनसंगठन, मंच, जुझारू स्‍वयंसेवक दस्‍ते, चौकसी दस्‍ते आदि तैयार करने होंगे। जो वाम जनवादी वास्‍तव में जूझने का जज्‍़बा और माद्दा रखते हैं, उन्‍हें छोटे-छोटे मतभेद भुलाकर एकजुट हो जाना चाहिए और काग़जी शेरों को कागज-कलम लेकर माफीनामा लिखने बैठ जाना चाहिए।







चुनावों में कांग्रेस की जीत से फासीवाद का खतरा कम नहीं होगा

May 29th, 2009 by Smash Fascism | 4 Comments

यह भूलना भी आत्‍मघाती होगा कि कांग्रेस ने ही पंजाब में धनी किसानों की पार्टी अकाली दल की धार्मिक भावनाओं पर कायम राजनीतिक आधार को खिसकाने के लिए भिण्डरांवाले को पैदा किया और जब वह उनके लिए ही भस्माओसुर बन गया तो उसे समाप्त करने के साथ ही पूरे पंजाब में आतंक राज कायम किया गया था। वी.पी. सिंह और चंद्रशेखर की सरकारों ने भी पंजाब की आंच पर अपनी चुनावी रोटियां सेंकने से अधिक कुछ नहीं किया। यही नहीं, इंदिरा गांधी-राजीव गांधी के समय से ही कांग्रेस भी ‘हिंदू-कार्ड’ खेलने की कोशिश करती रही है और इसकी सफलता में संदेह होने पर शाहबानो प्रकरण जैसे मामलों में मुस्लिम कट्टरपंथी ताकतों का तुष्टिकरण करके खोये हुए अल्पासंख्यक वोटों को फिर से अपनी झोली में डालने की कोशिशें भी करती रही है।








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फ़ासीवाद, धार्मिक कट्टरपंथ, सांप्रदायिकता संबंधी स्रोत सामग्री

यहां जिन वेबसाइट्स या ब्‍लॉग्‍स के लिंक दिए गए हैं, उन पर प्रकाशित विचारों-सामग्री से हमारी पूरी सहमति नहीं है। लेकिन एक ही स्‍थान पर स्रोत-सामग्री जुटाने के इरादे से यहां ये लिंक दिए जा रहे हैं।
 

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